Mithilesh Yadav
29 Nov 2025
इंदौर – मंदसौर के जॉइंट कलेक्टर राहुल चौहान पर आखिरकार दहेज प्रताड़ना की FIR दर्ज हो गई है। पीड़ित पत्नी का आरोप है कि शादी के बाद से ही उसने शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण झेला, लेकिन पति के ‘अफसर’ होने के प्रभाव के कारण पुलिस वर्षों तक शिकायत दर्ज करने से बचती रही। महिला थाना पुलिस ने अब रिपोर्ट तो दर्ज कर ली, बयान भी ले लिए, लेकिन हैरानी की बात यह कि इतना गंभीर मामला सिर्फ सामान्य धाराओं में निपटा दिया गया। FIR में आरोपी के अफसर होने का जिक्र तक नहीं—मानो कानून भी उसकी कुर्सी से डर गया हो। पीड़िता निर्मला चौहान (32) की शिकायत पर 27 नवंबर को दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की धारा 1, 4 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 115(2), 296(b) व 85 के तहत केस दर्ज किया गया, जिसकी जानकारी 28 नवंबर को सामने आई। लेकिन केस की धाराएं देखकर ही साफ लग रहा है कि आरोपी के ‘पद’ का कितना असर पड़ रहा है।
शादी के अगले ही दिन शुरू हो गई थी मारपीट
FIR के अनुसार निर्मला की शादी 16 दिसंबर 2018 को हुई थी। उस समय राहुल चौहान ट्रेनी डिप्टी कलेक्टर थे। पत्नी का आरोप है कि शादी के अगले दिन ही पति ने कम दहेज लाने का ताना मारकर गालियां देना और मारपीट शुरू कर दी थी। बाद में उसकी मां ने जमीन रजिस्ट्री के लिए 50 हजार रुपए ससुर को दिए, फिर भी प्रताड़ना नहीं रुकी।
दिल्ली ले जाकर भी पिटाई, फिर घर छोड़कर भागा
जून 2019 में UPSC की तैयारी के बहाने पति उसे दिल्ली ले गया। वहां भी मारपीट जारी रही। 31 जुलाई 2019 को पति उसे मायके पर छोड़ गया और तलाक की धमकी देकर महीनों तक पलटकर नहीं देखा।
मोबाइल तोड़ा, दहेज का दबाव, घर से निकाला
सितंबर 2019 में जब पत्नी खरगोन पहुंची, तो पति ने यह कहते हुए उसका फोन तोड़ दिया कि उसकी मां ने “लाखों का दहेज” नहीं दिया। इसके बाद जमकर मारपीट की और उसे घर से बाहर निकाल दिया। महिला ने खरगोन थाने में शिकायत की, परामर्श केंद्र में समझौते की कोशिशें हुईं लेकिन पति ने पत्नी को रखने से इनकार कर दिया।
गर्भावस्था के दौरान भी प्रताड़ना, मिसकैरेज का आरोप
पीड़िता ने आरोप लगाया कि 2020 की गर्भावस्था के दौरान भी husband की प्रताड़ना जारी रही, जिसके चलते उसका मिसकेरेज हो गया। इलाज बॉम्बे अस्पताल में चला। बाद में उसे पता चला कि पति किसी अन्य महिला के साथ रह रहा था।
जहाँ-जहाँ पदस्थ रहा, वहीं-वहीं उत्पीड़न—तलाक के लिए लगातार दबाव
निर्मला के अनुसार, धार, सरदारपुर और अन्य पदस्थापन स्थलों पर भी पति ने उत्पीड़न जारी रखा। जुलाई 2022 में पारिवारिक बैठक तक हुई, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया। इसके बाद पति घर छोड़कर चला गया।
राजनीतिक–प्रशासनिक प्रभाव के आरोप
पीड़िता के अधिवक्ता प्रवीण कचोले ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि FIR करवाने में कई स्तरों पर बाधाएँ डाली गईं। सरदारपुर थाने में शिकायत देने पर यह कहकर मना कर दिया गया कि “आरोपी वरिष्ठ अधिकारी है”—यानी अफसर की कुर्सी FIR से बड़ी हो गई थी।
अफसर का पलटवार – कहा ‘सारे आरोप झूठे’, इलाज के 15 लाख मैंने दिए
राहुल चौहान ने सारे आरोपों को बेबुनियाद बताया है। उनका कहना है कि “तलाक का केस 3.5 साल से चल रहा है, वह मैंने खुद लगाया है। अबॉर्शन करवाने की बात पूरी तरह झूठी है। आप बॉम्बे अस्पताल के दस्तावेज देख सकते हैं। उपचार का 15 लाख रुपये खर्च मैंने ही उठाया है।”
फिर सवाल वही—क्या कानून सभी के लिए समान है?
एक आम आदमी पर ऐसे ही आरोप लगे होते तो क्या पुलिस ‘सामान्य धाराओं’ में मामला दर्ज करती? क्या FIR में उसका पेशा छुपाया जाता? यही वह सवाल है, जो इस पूरे मामले को सिर्फ घरेलू विवाद नहीं बल्कि ‘अफसरशाही की ढाल’ से ढके अपराध के रूप में सामने लाता है।
कानून कहता है कि सब बराबर हैं, लेकिन घटनाएँ बार–बार साबित कर रही हैं कि कुर्सी जितनी ऊँची, उतना ही कानून का झुकाव भी।