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आरक्षण हटाओ आंदोलन: क्या रिजर्वेशन व्यवस्था में बदलाव की उठने लगी मांग?

आरक्षण के खिलाफ शुरू हुई मुहिम अब सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों तक पहुंच गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद जाति आधारित आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। प्रदर्शनकारी आरक्षण की समीक्षा, आर्थिक आधार को प्राथमिकता और मेरिट आधारित व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।
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आरक्षण हटाओ आंदोलन: क्या रिजर्वेशन व्यवस्था में बदलाव की उठने लगी मांग?
आरक्षण हटाओ आंदोलन

'आरक्षण हटाओ आंदोलन' से जुड़े लोगों ने बीते शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। इसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से सरकारी नौकरी और शिक्षा में जाति आधारित आरक्षण का विरोध करने वाले लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और आर्थिक आधार को ज्यादा महत्व देने की मांग उठाई। आंदोलन के अगले दिन आयोजकों में से एक हर्ष दुबे ने यूपी के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के साथ लखनऊ में प्रेस वार्ता की। हालांकि, बीजेपी या किसी बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक दल ने अब तक इस आंदोलन को औपचारिक समर्थन नहीं दिया है। आरक्षण को लेकर यह बहस सामाजिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक पिछड़ेपन और संविधान में तय व्यवस्था के बीच एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है।

जंतर-मंतर तक पहुंचा आरक्षण विरोधी आंदोलन

सोशल मीडिया से शुरू हुई 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' की मुहिम अब सड़कों पर भी दिखाई देने लगी है। बीते शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर इस आंदोलन से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में देश के अलग-अलग हिस्सों से सरकारी नौकरियों और शिक्षा में जाति के आधार पर आरक्षण का विरोध करने वाले लोग पहुंचे। इनमें कई हिंदुत्ववादी समूहों से जुड़े कार्यकर्ता भी शामिल थे। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और शाम होते-होते प्रदर्शनकारियों को वहां से हटा दिया गया।

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आर्थिक आधार और मेरिट को प्राथमिकता देने की मांग

प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने और जाति की जगह आर्थिक स्थिति को अधिक महत्व देने की है। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकारी नौकरी और शिक्षा में चयन का प्रमुख आधार मेरिट होना चाहिए। हालांकि, आंदोलन में शामिल सभी लोगों की मांगों को लेकर पूरी तरह एकरूपता नहीं है। इसके बावजूद मौजूदा प्रदर्शनों में जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा, आर्थिक आधार को प्राथमिकता, मेरिट आधारित चयन और आरक्षण का लाभ लगातार एक ही वर्ग तक पहुंचने जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं। कुछ प्रदर्शनकारी सरकार से आरक्षण से जुड़े विस्तृत आंकड़ों के साथ श्वेतपत्र जारी करने की मांग भी कर रहे हैं।

'प्रदर्शनकारियों की मांग को सरकार के सामने रखा जाएगा'

दिल्ली में प्रदर्शन के अगले ही दिन आयोजकों में से एक हर्ष दुबे ने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के साथ लखनऊ में प्रेस वार्ता की। इस दौरान आरक्षण से जुड़े मुद्दों को लेकर बातचीत हुई। ब्रजेश पाठक ने कहा कि प्रदर्शनकारियों की मांग को व्यवस्थित तरीके से सरकार के सामने रखा जाएगा। इस बातचीत के बाद आरक्षण सुधार से जुड़ी मांगों को लेकर राजनीतिक चर्चा जरूर तेज हुई है। 

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अमित शाह का बयान भी चर्चा में

प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का एक बयान भी लगातार पोस्ट किया जा रहा है। इसमें अमित शाह कहते हुए नजर आते हैं कि भारतीय जनता पार्टी आरक्षण को खत्म करने वाली नहीं है और अगर कोई इसे हटाना चाहेगा तो बीजेपी ऐसा नहीं होने देगी। वहीं, बीजेपी के किसी बड़े नेता की ओर से इस आंदोलन के समर्थन में अब तक कोई बयान सामने नहीं आया है। फिलहाल आंदोलन के समर्थकों में सामान्य वर्ग के युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र, युवा पेशेवर और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग प्रमुख रूप से शामिल हैं।  

'आरक्षण का मुद्दा सिर्फ गरीबी से जुड़ा नहीं'

इस बहस को समझने के लिए संविधान और स्वतंत्रता के बाद की सामाजिक स्थिति को समझना जरूरी है। आरक्षण केवल गरीबी दूर करने की योजना के तौर पर नहीं लाया गया था। भारत में लंबे समय तक जाति के आधार पर कुछ समुदायों को शिक्षा, सत्ता, सार्वजनिक संस्थानों और रोजगार के अवसरों से दूर रखा गया। संविधान निर्माताओं के सामने यह सवाल था कि क्या सिर्फ कानून के सामने समानता देने से उन समुदायों को वास्तविक बराबरी मिल पाएगी।

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सरकार और विपक्ष की आरक्षण पर अलग-अलग राय

आरक्षण हटाओ आंदोलन का बड़ा तर्क है कि आज किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को उसकी जाति से ज्यादा महत्व मिलना चाहिए। वहीं, आरक्षण के समर्थकों का कहना है कि गरीबी और जातिगत भेदभाव दो अलग समस्याएं हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। उनके अनुसार, आर्थिक परेशानी के लिए छात्रवृत्ति, फीस में छूट और आर्थिक सहायता जैसे उपाय किए जा सकते हैं, जबकि आरक्षण का उद्देश्य प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना और वंचित समुदायों को बराबरी का अवसर देना है। बीजेपी की आधिकारिक राष्ट्रीय नीति आरक्षण खत्म करने की नहीं रही है। केंद्र सरकार एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने के साथ आरक्षित पदों की रिक्तियां भरने पर भी जोर दे रही है। हाल में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने के विचार का विरोध किया था और कहा था कि इसका आधार आर्थिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव है। दूसरी ओर, विपक्षी दल आरक्षण के विस्तार और जातिगत प्रतिनिधित्व की बात करते रहे हैं। कांग्रेस जाति जनगणना और 50 फीसदी की आरक्षण सीमा हटाने की मांग करती रही है। 

Rohit Sharma
By Rohit Sharma

पीपुल्स इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय...Read More

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