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न्यायाधीश बनने से पहले हुआ अन्याय.. माँ अहिल्या की नगरी में नारी से नाइंसाफी

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न्यायाधीश बनने से पहले हुआ अन्याय.. माँ अहिल्या की नगरी में नारी से नाइंसाफी
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

     इंदौर  न्यायाधीश बनने से पहले ही अन्याय हो जाए तो आपको भी सोच में पढ़ जाएंगे कि ऐसा क्या हुआ की न्यायाधीश को न्याय नहीं मिला। मामला इंदौर के समीप खातेगाँव की एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी प्राची अग्रवाल का है, जिसके पिता और भाई-बहनों के कई सपने उससे जुड़े थे। वर्ष 2018 में प्राची बीए-एलएलबी की पढ़ाई करने इंदौर आई थी, लेकिन विश्वविद्यालय की एक चूक ने उसका न्यायधीश बननेका सपना तोड़ दिया।

    प्राची ने पीपुल्स अपडेट की टीम  को बताया कि वह अपने परिवार के सपनों को पूरा करने के लिए खातेगाँव से इंदौर आई थी। शुरुआत में उसने राजस्थान के वनस्थली विद्यापीठ में प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था, परंतु परिवार से अधिक दूरी होने के कारण उसे इंदौर आना पड़ा। सिविल जज की प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद वह लगातार मेंस परीक्षा की तैयारी में जुटी थी, लेकिन जब बीए-एलएलबी का परिणाम आया तो वह हैरान रह गई।

     

    उसके कुल अंक अपेक्षा से कम निकले- 

    जहां अन्य विद्यार्थियों को 5600 में से अंक दिए गए थे, वहीं प्राची को 5300 में से अंक दर्शाए गए। जाँच करने पर पता चला कि विश्वविद्यालय (डीएवीवी) ने तीन विषयों अपकृत्य कानून, अनुबंध कानून-I और अनुबंध कानून-II — के अंक जोड़ना ही भूल गया था। परिणामस्वरूप, जहाँ उसका योग 5600 अंकों पर होना चाहिए था, वहीं डीएवीवी ने गलती से 5300 अंकों के आधार पर अंतिम मार्कशीट जारी कर दी। प्राची ने बताया कि वह इसके बावजूद प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई, लेकिन इस त्रुटि के कारण उसका प्रतिशत 69.67% आया, जबकि सिविल जज परीक्षा के लिए 70% अंक अनिवार्य हैं। विश्वविद्यालय की इस एक गलती ने उसकी वर्षों की मेहनत और परिवार के सपनों पर पानी फेर दिया।

      

    तू डाल-डाल, मैं पात-पात” – 

    प्राची वर्तमान में इंदौर में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत हैं। डीएवीवी द्वारा उसकी मार्कशीट में दस विषयों के अंक नहीं जोड़े जाने के विरोध में उसने हाई कोर्ट की शरण ली थी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने डीएवीवी को आदेश दिया कि वह प्राची की संशोधित मार्कशीट जारी करे और ऐसे विद्यार्थियों के लिए नीति बनाए, जिन्हें अन्य विश्वविद्यालयों से ट्रांसफर लेकर प्रवेश दिया गया है, ताकि भविष्य में उन्हें ऐसी परेशानियों का सामना न करना पड़े।लेकिन डीएवीवी ने अदालत के निर्देशों पर अमल करने के बजाय नया रास्ता अपनाया। मार्कशीट जारी करने और जवाब प्रस्तुत करने के स्थान पर विश्वविद्यालय ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख कर लिया। अब यह मामला उच्चतम न्यायालय में पहुँच गया है, जहाँ यह देखा जाएगा कि आखिर गलती सुधारने से बचने के पीछे विश्वविद्यालय की मंशाक्या थी न्याय से बचना या अपनी भूल छिपाना।

     मुझे न्याय की उम्मीद है” – प्राची

    प्राची का कहना है कि मेरे भविष्य का जितना नुकसान होना था, वह हो चुका है। लेकिन अब मुझे केवल न्याय की उम्मीद है। डीएवीवी ने 1 नवंबर को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद विश्वविद्यालय का सुप्रीम कोर्ट जाना किस लाभ के लिए है, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय से न्याय अवश्य मिलेगा।

    Hemant Nagle
    By Hemant Nagle

    हेमंत नागले | पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। वर्ष 2004 में मास्टर ऑफ जर्...Read More

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