नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आयुष (AYUSH) डॉक्टरों को भी रजिस्टर्ड डॉक्टर मानने वाली जनहित याचिका (PIL) को लेकर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस याचिका पर कानून मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और आयुष मंत्रालय से जवाब मांगा है। यह जनहित याचिका (PIL) नितिन उपाध्याय द्वारा दायर की गई है। इसमें मांग की गई है कि 1954 के एक कानून में शामिल अनुसूची की समीक्षा और अद्यतन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए, ताकि दवाओं के विज्ञापन को नियंत्रित करने से जुड़े प्रावधानों को वर्तमान वैज्ञानिक विकास के अनुरूप बनाया जा सके।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 की धारा 2(cc) के तहत AYUSH डॉक्टरों को भी ‘पंजीकृत चिकित्सा प्रैक्टिशनर’ माना जाए। याचिका में कहा गया है कि यह अधिनियम जनता को भ्रामक और झूठे चिकित्सीय विज्ञापनों से बचाने के लिए बनाया गया था। हालांकि, अधिनियम की धारा 3(d) कुछ बीमारियों और स्थितियों से संबंधित दवाओं के विज्ञापन पर पूरी तरह से रोक लगाती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि AYUSH डॉक्टर और अन्य वास्तविक गैर-एलोपैथिक पंजीकृत चिकित्सक अधिनियम की धारा 14 में दी गई छूट के दायरे में नहीं आते। इस कारण वे गंभीर बीमारियों से जुड़ी दवाओं के अस्तित्व के बारे में भी विज्ञापन नहीं कर पाते, जिससे जनता में जानकारी की कमी बनी रहती है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि दवाओं और उपचारों से जुड़े विज्ञापन सत्य, वैज्ञानिक आधार पर और गैर-भ्रामक हों, तो वे उपभोक्ताओं और मरीजों तक वैध जानकारी पहुंचाने का माध्यम हो सकते हैं। इसके साथ ही, PIL में केंद्र सरकार से आग्रह किया गया है कि वह वर्तमान वैज्ञानिक प्रगति और साक्ष्य-आधारित चिकित्सा ज्ञान के अनुरूप DMR अधिनियम की अनुसूची की समीक्षा, संशोधन और अद्यतन के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करे।