इंदौर : ट्रैफिक व्यवस्था पर हाईकोर्ट सख्त, ई-रिक्शा पॉलिसी, चालान वसूली और मोबाइल कोर्ट जैसे मुद्दों पर दिए महत्वपूर्ण निर्देश

इंदौर। शहर की बिगड़ती ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर साल 2019 से लंबित जनहित याचिका पर मंगलवार को हाईकोर्ट इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई, जिसमें पहली बार शहर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अधिवक्ता के रूप में पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी की डबल बेंच ने उन्हें न्याय मित्र (Amicus Curiae) के रूप में नियुक्त किया। यह नियुक्ति ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर न्यायालय को विशेषज्ञ और निष्पक्ष राय देने के उद्देश्य से की गई है।
35 लाख की जनसंख्या में सख्ती जरूरी : महापौर
महापौर भार्गव ने कोर्ट में कहा कि इंदौर की आबादी लगभग 35 लाख है और शहर में वाहनों की संख्या भी इतनी ही है, ऐसे में ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कोर्ट के समक्ष ई-रिक्शा पॉलिसी, फुटपाथ से अतिक्रमण हटाने, मोबाइल कोर्ट की शुरुआत और विभागीय समन्वय समिति के गठन जैसे कई प्रभावी सुझाव रखे।
ई-रिक्शा पॉलिसी की जरूरत
शहर में बेतरतीब चल रहे ई-रिक्शा के संचालन पर महापौर ने केंद्र और राज्य सरकार की गाइडलाइंस के अनुरूप स्पष्ट नीति बनाने पर जोर दिया। उन्होंने “ट्रैफिक मित्र” जैसे अभियानों को और तेज़ करने की मांग की, ताकि ट्रैफिक नियमों के पालन में नागरिकों की भागीदारी बढ़े।
चालान वसूली अब वाहन बीमा से होगी लिंक?
हाईकोर्ट ने टू-व्हीलर चालकों के लंबित चालानों पर चिंता जताते हुए सुझाव दिया कि हर साल वाहन बीमा के समय बकाया चालान की वसूली की व्यवस्था की जाए। इससे चालान अदायगी सुनिश्चित हो सकेगी और नियमों के पालन की दर बढ़ेगी।
पार्किंग, कोचिंग और हॉस्टलों के लिए बने नए नियम
महापौर ने ट्रैफिक इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से यह भी कहा कि शहर में कॉलेज, हॉस्टल और कोचिंग संस्थानों की पार्किंग व्यवस्था को लेकर नए दिशा-निर्देश बनाए जाने चाहिए। ऑन-स्ट्रीट और ऑफ-स्ट्रीट पार्किंग के बीच संतुलन बनाते हुए नए नियोजन की जरूरत है।
बायपास की जर्जर हालत पर कोर्ट नाराज
सुनवाई के दौरान एनएचएआई की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही। कोर्ट ने नोट किया कि कई बार हलफनामे देने के बावजूद एनएचएआई ने बायपास की हालत नहीं सुधारी। बायपास पर जानलेवा गड्ढे, बंद स्ट्रीट लाइटें, खराब सर्विस रोड और अधूरी खुदाई शहर के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। कोर्ट ने इस पर भी सख्ती दिखाई।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि ट्रैफिक पुलिस चालान काटने में तो व्यस्त रहती है, लेकिन वास्तविक ट्रैफिक प्रबंधन पर ध्यान नहीं देती। निजी बसों के अवैध स्टैंड, अव्यवस्थित अतिक्रमण और ट्रैफिक सिग्नलों की कमी भी जाम की बड़ी वजहें हैं।
समन्वय समिति के गठन का सुझाव
न्यायालय ने महापौर के सुझावों पर सहमति जताते हुए कहा कि जिला प्रशासन, पुलिस और नगर निगम के बीच बेहतर समन्वय के लिए एक स्थायी समिति बनाई जाए, जो समय-समय पर बैठकें कर ट्रैफिक से जुड़ी समस्याओं का समाधान करें।





















