जहरीली शराब रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सुझाव, मेथनॉल संबंधी नियम भी रद्द

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18ए और 18बी को रद्द करते हुए राज्यों के लिए कई सुझाव दिए। अदालत ने पुलिस, आबकारी, निषेध, परिवहन और उद्योग विभाग को मिलकर काम करने की जरूरत बताई। सुप्रीम कोर्ट ने मेथनॉल की बिक्री, इस्तेमाल, परिवहन और स्टॉक की निगरानी मजबूत करने पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि जहरीली शराब की समस्या से निपटने के लिए मांग और आपूर्ति, दोनों स्तर पर प्रभावी कार्रवाई जरूरी है।
विभागों के बीच तालमेल बढ़ाने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के लिए केवल एक विभाग के स्तर पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को पुलिस, आबकारी, निषेध, परिवहन और उद्योग विभाग के बीच बेहतर तालमेल बनाकर रणनीति तैयार करनी चाहिए। अदालत ने अवैध शराब के निर्माण, परिवहन और बिक्री पर एक साथ कार्रवाई की जरूरत बताई। इसके लिए स्थानीय स्तर पर शराब बनाने वाली जगहों की पहचान कर पुलिस और आबकारी विभाग को संयुक्त कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि शराब की खरीद, निर्माण, परिवहन, बिक्री और सेवन से जुड़े मौजूदा कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी है।
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सीमा पर निगरानी बढ़ाने की सलाह
अदालत ने राज्यों को अपनी सीमाओं पर निगरानी मजबूत करने की सलाह दी है, क्योंकि अवैध शराब राज्य के भीतर तैयार होने के साथ ही दूसरे राज्यों से भी लाई जा सकती है। परिवहन विभाग की ओर से सीमा पर वाहनों की जांच और निगरानी बढ़ाने से अवैध शराब की आवाजाही पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जहरीली शराब की समस्या से निपटने के लिए केवल निर्माण स्थलों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सप्लाई चेन के अलग-अलग स्तरों पर निगरानी जरूरी है। अदालत ने मांग और आपूर्ति दोनों पर एक साथ रोक लगाने की जरूरत बताई है।
मेथनॉल की बिक्री और स्टॉक पर नजर
सुप्रीम कोर्ट ने मेथनॉल के इस्तेमाल और उसकी आवाजाही पर कड़ी निगरानी की जरूरत बताई। अदालत के मुताबिक नकली शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक सॉल्वेंट औद्योगिक इकाइयों से अवैध तरीके से हासिल किए जा सकते हैं। इसलिए उद्योग विभाग को ऐसी इकाइयों पर निगरानी रखनी चाहिए, जो रासायनिक सॉल्वेंट बनाती और बेचती हैं। मेथनॉल से जुड़े लाइसेंस और परमिट जारी करने की व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करने का सुझाव दिया गया है। लाइसेंस लेने वाले व्यक्ति को मेथनॉल की खपत और बचे हुए स्टॉक का रिकॉर्ड रखना चाहिए और समय-समय पर दोनों का मिलान कर किसी भी कमी की जांच करनी चाहिए। नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस या परमिट निलंबित अथवा रद्द करने और आगे नया लाइसेंस देने पर रोक लगाने की व्यवस्था भी प्रभावी हो सकती है।
विशेष टैंकर से मेथनॉल परिवहन का सुझाव
अदालत ने मेथनॉल के परिवहन को लेकर भी सावधानी बरतने की जरूरत बताई है। सुझाव दिया गया है कि मेथनॉल को उसके लिए तय विशेष टैंकरों से ही एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाए। इससे रसायन की आवाजाही पर निगरानी रखने और उसके अवैध इस्तेमाल की आशंका को कम करने में मदद मिल सकती है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि मेथनॉल जैसे खतरनाक पदार्थ की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है। हालांकि, नियंत्रण के ऐसे उपाय भी होने चाहिए जो अपने उद्देश्य को हासिल करने के साथ वैध औद्योगिक गतिविधियों पर अनावश्यक और अनुपातहीन बोझ न डालें।
महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स 1972 के नियम 18ए और 18बी रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स, 1972 के नियम 18ए और 18बी को रद्द कर दिया। इन नियमों को 2011 की अधिसूचना के जरिए 1991 में मुंबई में हुई जहरीली शराब त्रासदी के बाद जोड़ा गया था। नियम 18ए के तहत मेथनॉल बेचने वाले को खरीदार के फॉर्म ए लाइसेंस की जांच करनी होती थी और दवा निर्माण के अलावा दूसरे इस्तेमाल के लिए बेचते समय मेथनॉल में तय मात्रा में रंग और कड़वा पदार्थ मिलाना जरूरी था। नियम 18बी के तहत वैध फॉर्म ए लाइसेंस के बिना किसी व्यक्ति के पास मिला मेथनॉल जब्त किया जा सकता था। अदालत ने इन पाबंदियों को संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) के तहत मिले अधिकारों के अनुरूप नहीं माना और इन्हें रद्द कर दिया।
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1991 की त्रासदी के बाद बदले थे नियम
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक 1991 में मुंबई के अंधेरी इलाके में जहरीली शराब पीने से करीब 93 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने जहरीली शराब की घटनाओं के कारणों और रोकथाम के उपायों पर विचार के लिए समिति बनाई थी। समिति की सिफारिशों के बाद 2011 की अधिसूचना के जरिए महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स में बदलाव किए गए और मेथनॉल की बिक्री को लेकर नियम 18ए और 18बी जोड़े गए। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मेथनॉल जहरीला और खतरनाक पदार्थ है और इसकी बिक्री और इस्तेमाल को नियंत्रित करना जरूरी है। हालांकि, अदालत ने कहा कि केवल मेथनॉल में रंग और कड़वा पदार्थ मिलाने जैसे उपाय अवैध शराब बनाने की पूरी समस्या का समाधान नहीं करते। इसलिए अदालत ने राज्यों को विभागों के बीच तालमेल, बेहतर निगरानी और मौजूदा कानूनों के प्रभावी इस्तेमाल पर ध्यान देने के सुझाव दिए हैं।




















