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चरखे से अशोक चक्र तक… जानिए कितनी बार बदला देश का झंडा और कैसे बना आज का तिरंगा

भारत का तिरंगा आज जैसा दिखता है, हमेशा से ऐसा नहीं था। आजादी की लड़ाई के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के डिजाइन में कई बदलाव हुए। 1906 से 1947 तक झंडे के रंग, प्रतीक और डिजाइन बदलते रहे। जानिए मैडम भीकाजी कामा, पिंगली वेंकैया और महात्मा गांधी के योगदान के साथ तिरंगे के मौजूदा स्वरूप तक पहुंचने की पूरी कहानी।
चरखे से अशोक चक्र तक… जानिए कितनी बार बदला देश का झंडा और कैसे बना आज का तिरंगा
भारत का तिरंगा आज जैसा दिखता है, हमेशा से ऐसा नहीं था।

भारत का राष्ट्रीय ध्वज सिर्फ तीन रंगों वाला कपड़ा नहीं है। तिरंगा देश की आजादी, एकता, साहस और लोकतांत्रिक पहचान का प्रतीक है। 15 अगस्त को लाल किले पर जब तिरंगा शान से लहराता है, तो हर भारतीय के लिए यह गर्व का पल होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज हम जिस तिरंगे को देखते हैं, वह हमेशा से ऐसा नहीं था? आज के राष्ट्रीय ध्वज तक पहुंचने में कई साल लगे। आजादी की लड़ाई के दौरान झंडे के डिजाइन और उसमें शामिल प्रतीकों में कई बदलाव किए गए। इतिहास में इसे आम तौर पर करीब छह प्रमुख चरणों में देखा जाता है, हालांकि अलग-अलग स्रोतों में इसकी संख्या थोड़ी अलग मिल सकती है।

1906 में पहली बड़ी कोशिश

भारतीय झंडे के इतिहास की शुरुआत अक्सर 7 अगस्त 1906 से मानी जाती है। उस दिन कलकत्ता के पारसी बागान स्क्वायर में एक झंडा फहराया गया था। इस झंडे में तीन क्षैतिज पट्टियां थीं। इसमें कमल के फूल, ‘वंदे मातरम्’ और सूर्य-चंद्रमा जैसे प्रतीक शामिल थे। यह झंडा आज के तिरंगे से काफी अलग था, लेकिन इसे राष्ट्रीय ध्वज के शुरुआती प्रमुख प्रयासों में माना जाता है।

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1907 में मैडम भीकाजी कामा का झंडा

इसके बाद 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टुटगार्ट में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का झंडा फहराया। यह भारत के बाहर भारतीय आजादी की आवाज को मजबूती से रखने वाला महत्वपूर्ण कदम था। इस झंडे में भी तीन रंगों की पट्टियां थीं। इसमें ‘वंदे मातरम्’, कमल और सूर्य-चंद्रमा जैसे प्रतीक शामिल थे। इसका डिजाइन 1906 के झंडे से मिलता-जुलता था।

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1917 में बदला झंडे का रूप

1917 में एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक के होमरूल आंदोलन के दौरान एक अलग झंडे का इस्तेमाल किया गया। इसमें लाल और हरे रंग की कई पट्टियां थीं। साथ ही सात सितारे और ऊपर यूनियन जैक का निशान भी था। यह झंडा आज के तिरंगे से बिल्कुल अलग था, लेकिन उस समय यह भारत में स्वशासन की मांग का प्रतीक बना।

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1921 में पिंगली वेंकैया का योगदान

तिरंगे के इतिहास में पिंगली वेंकैया का नाम बेहद महत्वपूर्ण है। 1921 में विजयवाड़ा में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के सामने एक झंडे का डिजाइन पेश किया। शुरुआती डिजाइन में लाल और हरे रंग का इस्तेमाल किया गया था। महात्मा गांधी ने इसमें सफेद रंग जोड़ने का सुझाव दिया। साथ ही झंडे में चरखे को जगह दी गई। उस समय चरखा स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और आजादी की लड़ाई का बड़ा प्रतीक था।

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1931 में तिरंगा आज के करीब पहुंचा

1931 का साल भारतीय झंडे के इतिहास में बड़ा बदलाव लेकर आया। इस दौरान ऐसा तिरंगा सामने आया जो आज के झंडे से काफी मिलता-जुलता था। इसमें ऊपर केसरिया, बीच में सफेद और नीचे हरा रंग था। बीच में चरखा बना था। कांग्रेस ने इसी साल इस झंडे को स्वीकार किया। हालांकि भारत तब भी ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए यह आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज नहीं था। फिर भी यह स्वतंत्रता आंदोलन की पहचान बन गया।

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1947 में मिला आज का तिरंगा

भारत की आजादी से कुछ दिन पहले 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। आज के तिरंगे में ऊपर गहरा केसरिया, बीच में सफेद और नीचे गहरा हरा रंग है। सफेद पट्टी के बीच नीले रंग का अशोक चक्र है, जिसमें 24 तीलियां हैं।

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सबसे बड़ा बदलाव यह था कि चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल किया गया। यह सारनाथ के सिंह स्तंभ के धर्मचक्र से प्रेरित है और गति, धर्म व प्रगति का प्रतीक माना जाता है। इस तरह कई सालों के बदलाव, प्रयोग और स्वतंत्रता आंदोलन की लंबी यात्रा के बाद तिरंगे को उसका वर्तमान स्वरूप मिला। आज यही तिरंगा स्वतंत्र भारत की शान और पहचान है।

Dolly Wasvani
By Dolly Wasvani

डोली वासवानी | People’s Institute of Media Studies से BAMC Student। पत्रकारिता की दुनिया में नई शुरु...Read More

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