ब्रिसबेन। 1860 के दशक में ग्लासगो में तैयार किया गया जहाज 'सिटी ऑफ एडिलेड' आज समंदर के बीच एक छोटे से जंगल में बदल चुका है। मौजूदा हालत तक पहुंचने से पहले इस जहाज (लंबाई 77 मीटर) ने कई पड़ाव देखे हैं। लोहे से बने इस जहाज की शुरुआत एक पैसेंजर और डाक ले जाने वाले स्टीमर के तौर पर हुई थी। समय के साथ इसके इस्तेमाल में कई बदलाव हुए। यात्रियों को लाने-ले जाने वाला यह जहाज बाद में कोयला स्टोर करने के लिए भी उपयोग में लिया गया। 1912 में लगी भीषण आग में यह बुरी तरह जल गया। इसके बाद इसे खरीदकर पर्यटकों के ठहरने की जगह के तौर पर विकसित करने की योजना बनी। लेकिन 1916 में इसे कॉकल बे में ले जाते समय यह जमीन पर फंस गया और वहीं रह गया। एक सदी से भी ज्यादा समय बीतने के बाद अब इसके जंग लगे मलबे पर मैंग्रोव के पेड़ उग आए हैं। हरियाली से ढका यह मलबा अब मैग्नेटिक आइलैंड, क्वींसलैंड के समंदर और कुदरती खूबसूरती का एक अनोखा हिस्सा बन गया है।
1863 में बनना शुरू हुआ था जहाज
इस जहाज को स्कॉटलैंड के ग्लासगो में बनाया गया था। J&G थॉमसन कंपनी ने इसे 1863 में बनाना शुरू किया था और 1864 में पूरा किया था। जहाज को यात्रियों और सामान की ढुलाई के लिए बनाया गया था। यह मेलबर्न और सिडनी समेत ऑस्ट्रेलिया के कई बंदरगाहों के बीच चलता था। बाद में इसने ऑस्ट्रेलिया से आगे न्यूजीलैंड, अमेरिका के होनोलूलू और सैन फ्रांसिस्को तक जाने वाले रूटों पर मेल स्टीमर के तौर पर काम किया। हालांकि 1890 में इसकी स्टीम मशीनरी हटा दी गई और इसे सेलिंग शिप बना दिया गया जिसमें चार मस्तूल थे।
और भी हुए बदलाव
1902 तक यह टाउन्सविले में कोयला रखने वाला एक बड़ा जहाज (hulk) बन चुका था। 1912 में इसके कोयले के कार्गो में आग लग गई और जहाज क्षतिग्रस्त हो गया। इसके बाद इस जहाज की नई कहानी शुरु हुई। साल 1915 में मैग्नेटिक आइलैंड के एक व्यापारी जॉर्ज बटलर ने इसे खरीद लिया। बटलर इसे पर्यटकों के ठहरने की जगह के तौर पर इस्तेमाल करना करना चाहते थे। वे इसे पिकनिक बे में ब्रेकवाटर और जेटी का हिस्सा भी बनाने का प्लान कर रहे थे। हालांकि, जब जहाज को खींचकर मैग्नेटिक आइलैंड ले जाया जा रहा था तब वह उथले पानी में फंस गया। यह घटना साल 1916 की है। जब इसे लाया जा रहा था तो कॉकल बे में फंसा यह जहाज वहां से कभी भी नहीं निकल सका।
मैग्नेटिक आइलैंड का हिस्सा बना
ABC की रिपोर्ट के मुताबिक 1920 के दशक तक पर्यटक इसके मलबे को देखने के लिए आते थे। 1942 में ट्रेनिंग के दौरान रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स का एक विमान इस मलबे के मस्तूल (mast) से टकरा गया। इस दुघर्टना में विमान में सवार चार लोगों की मौत हो गई। 1971 में आए तूफान ने मलबे को और नुकसान पहुंचाया जिससे इसके कई हिस्सों के टुकड़े हो गए, लेकिन कॉकल बे (Cockle Bay) इसके काफी बड़े हिस्से रह गए।
मलबे के बीच मैंग्रोव उग आए
दशकों तक वहीं पड़े रहने से यह मलबा अब तट का ही हिस्सा बन चुका है। इसकी लोहे की बॉडी के अंदर और आस-पास घने मैंग्रोव उग आए हैं। ड्रोन से देखने पर यह किसी जहाज के मलबे से ज्यादा एक छोटे हरे-भरे टापू जैसा लगता है। ग्रेट बैरियर रीफ मरीन पार्क अथॉरिटी इसे मैग्नेटिक आइलैंड के आस-पास के ऐतिहासिक जहाजों के मलबों में गिनती है और बताती है कि ऐसे मलबे समंदर में जीवों को रहने के लिए नया ठिकाना देकर इकोसिस्टम को सहारा देते हैं। हालांकि, मैंग्रोव इतने फैल चुके हैं कि अब किनारे से इस जहाज को देख पाना मुश्किल हो गया है।