अमेरिकी न्यूक्लियर छतरी पर भरोसा कम, फ्रांस का राफेल प्लान, रूस को रोकने के लिए यूरोप में परमाणु तैनाती की तैयारी

पेरिस। यूरोप एक ऐसे फ्यूचर की तैयारी कर रहा है जहां अमेरिका की 'न्यूक्लियर अम्ब्रेला' यानी परमाणु सुरक्षा कवच का भरोसा शायद हमेशा न रहे। ऐसे में फ्रांस चाहता है कि उसके न्यूक्लियर हथियारों से लैस राफेल फाइटर जेट रूस पर लगाम लगाने में हेल्प करें।'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' की एक रिपोर्ट के अनुसार, फ्रेंच प्रेसिडेंट इमैनुएल मैक्रों पूरे यूरोप में फ्रांस की 'न्यूक्लियर डिटरेंस' कैपेसिटी का विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब अमेरिकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यूरोपियन एलायंस पर अपनी सुरक्षा की ज्यादा जिम्मेदारी खुद उठाने का प्रेशर डाल रहे हैं।
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प्लान का नाम होगा फॉरवर्ड डिटरेंस
'फॉरवर्ड डिटरेंस' (Forward Deterrence) नाम की इस प्लान में एलाइड कंट्रीज ( यूरोप के संबंधित देशों ) में न्यूक्लियर कैपेबल राफेल फाइटर जेट्स की तैनाती, इंटेलिजेंस शेयरिंग का दायरा बढ़ाना और जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज करना शामिल हो सकता है। फ्रांस के न्यूक्लियर वेपन्स पर पूरा कंट्रोल उसी का रहेगा, लेकिन इस इनिशिएटिव से यूरोपियन पार्टनर्स को मॉस्को यानी रूस के साथ पोटेंशियल कॉन्फ्लिक्ट की तैयारियों में बड़ी भूमिका निभाने का मौका मिल सकता है।
फ्रांस के अलावा 10 यूरोपियन देश शामिल
'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' के मुताबिक, इस प्रयास में फ्रांस के अलावा 10 यूरोपियन देश शामिल हैं। इनमें यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, पोलैंड, नीदरलैंड, बेल्जियम, ग्रीस, फिनलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क शामिल हैं।इन देशों की पार्टिसिपेशन का लेवल अलग-अलग है। इसमें मिलिट्री एक्सरसाइज, इंटेलिजेंस शेयरिंग और न्यूक्लियर डिटरेंस पर डिस्कशन जैसे कोऑपरेशन शामिल हो सकते हैं। इटली ने इस इनिशिएटिव में शामिल होने से इनकार कर दिया है, जबकि तीन बाल्टिक देश- एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया- भी इस मौजूदा ग्रुप का हिस्सा नहीं हैं।
वॉशिंगटन पर भरोसा घटा
फ्रांस की यह पहल ऐसे टाइम में सामने आई है, जब यूरोप की सरकारें इस बात पर विचार कर रही हैं कि रूस को रोकने के लिए वे वॉशिंगटन पर किस हद तक भरोसा कर सकती हैं। ट्रंप ने बार-बार नाटो एलाइज से डिफेंस पर ज्यादा खर्च करने और यूरोप की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी उठाने के लिए कहा है। इससे इस बात पर डिबेट छिड़ गई है कि यूरोप अमेरिकी मिलिट्री सिक्योरिटी पर कितना डिपेंडेंट है। नाटो की न्यूक्लियर डिटरेंस कैपेसिटी में अमेरिका की भूमिका सबसे अहम है। मौजूदा 'न्यूक्लियर-शेयरिंग' अरेंजमेंट के तहत, यूरोप के कई लोकेशंस पर अमेरिकी न्यूक्लियर वेपन्स तैनात हैं। हालांकि, भविष्य में वॉशिंगटन की कमिटमेंट्स को लेकर जताई जा रही चिंताओं ने फ्रांस को सिक्योरिटी की एक एडिशनल लेयर के रूप में अपने इंडिपेंडेंट न्यूक्लियर आर्सेनल को प्रमोट करने के लिए प्रेरित किया है।
अमेरिका शायद रूस के साथ न्यूक्लियर टकराव से पीछे हटे
फ्रांस का यह स्टैंड एक पुरानी स्ट्रैटेजिक चिंता को दर्शाता है कि किसी यूरोपियन मित्र देश की सुरक्षा के लिए अमेरिका शायद रूस के साथ न्यूक्लियर टकराव का रिस्क उठाने से हिचकिचाए। पेरिस अपने दोस्तों को इसका भरोसा दिलाना चाहता है, लेकिन वह नाटो की मौजूदा व्यवस्था को बदलना नहीं चाहता। न ही अपने न्यूक्लियर वेपन्स का कंट्रोल दूसरे देशों को देना चाहता है। फ्रांस के प्लान के केंद्र में न्यूक्लियर कैपेबल राफेल फाइटर जेट्स हैं। इस प्रयास में फ्रांस के राफेल फाइटर जेट्स एक अहम रोल निभा सकते हैं, क्योंकि ये जेट्स देश की ASMP-A न्यूक्लियर-इनेबल्ड एयर-लॉन्च्ड क्रूज मिसाइल कैरी करने में केपेबल हैं।
कई प्लेटफॉर्म से फायर कर सकते हैं मिसाइल को
यह मिसाइल फ्रांस को सबमरीन से फायर की जाने वाली न्यूक्लियर क्षमता के अलावा हवा से न्यूक्लियर अटैक करने की क्षमता भी देती है। इससे पेरिस एक ऐसा 'डिटरेंट' बना कर रख सकता है जो कई अलग-अलग प्लेटफॉर्म से काम कर सके। मित्र देशों में न्यूक्लियर-इनेबल्ड राफेल फाइटर जेट्स को तैनात करने से संकट के समय फ्रेंच जेट्स के ऑपरेशन के लिए लोकेशंस का दायरा बढ़ सकता है। इससे रूस की मिलिट्री प्लानिंग और ज्यादा कठिन हो सकती है।




















