Naresh Bhagoria
28 Jan 2026
प्रयागराज। माघ मेला से ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दुखी मन से मेला छोड़ने का ऐलान कर दिया है। बुधवार सुबह आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि वह आस्था और श्रद्धा के साथ माघ मेला में आए थे, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि बिना संगम स्नान किए ही लौटना पड़ रहा है। उन्होंने कहा हमने अन्याय को अस्वीकार किया है और न्याय की प्रतीक्षा करेंगे। आज स्वर बोझिल हैं और शब्द साथ नहीं दे रहे हैं। भारी मन लेकर प्रयाग से लौटना पड़ रहा है। प्रयाग में जो घटित हुआ उसने झकझोर दिया है। आज मन व्यथित है, बिना स्नान किए यहां से विदा ले रहे हैं। न्याय की प्रतीक्षा कभी खत्म नहीं होती।
शंकराचार्य ने कहा कि माघ मेला के दौरान एक ऐसी घटना घटी, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। इस घटना ने उन्हें गहरे मानसिक आघात में डाल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि माघ मेला में स्नान करना उनके लिए केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि आस्था और आत्मिक संतोष का विषय था। बावजूद इसके, मौजूदा हालात को देखते हुए उन्होंने मेला छोड़ने का कठिन निर्णय लिया। उनके इस फैसले के बाद संत समाज और श्रद्धालुओं के बीच चर्चा तेज हो गई है।
शंकराचार्य ने कहा, आज हम यहां से जा रहे हैं, लेकिन अपने पीछे सत्य की गूंज छोड़कर जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि कल शाम और प्रातः काल प्रशासन की ओर से उनके मुख्य कार्याधिकारी को एक प्रस्ताव भेजा गया था, जिसमें कहा गया था कि जब वे चाहें, ससम्मान संगम स्नान कराया जाएगा और अधिकारी उपस्थित रहकर पुष्पवर्षा करेंगे। शंकराचार्य ने कहा कि इस प्रस्ताव में उस दिन की घटना के लिए क्षमा याचना नहीं थी। हमें लगा कि यदि हम स्नान कर लेते और पुष्पवर्षा स्वीकार कर लेते, तो उस दिन की बात अधूरी रह जाती।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जिस असली मुद्दे के लिए वे दस दिन तक फुटपाथ पर बैठे रहे, उस पर कोई ठोस पहल नहीं हुई। उन्होंने कहा दस–ग्यारह दिन बीत जाने के बाद, जब हमने जाने का निर्णय लिया, तब ऐसा प्रस्ताव आया। अगर इसे स्वीकार कर लेते तो अपने भक्तों के साथ न्याय नहीं कर पाते।
शंकराचार्य ने कहा कि जो मुगलों के समय हुआ, वही आज दोहराया जा रहा है। एक ओर गृहमंत्री का बयान आता है कि संतों का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, वहीं माघ मेले में संतों को चोटी और शिखा पकड़कर घसीटा गया और पीटा गया। उन्होंने कहा कि यह सरकार के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। इसके बाद उन्होंने दो मिनट का मौन रखकर संतों के अपमान के दोषियों को दंड मिलने की प्रार्थना की।
शंकराचार्य ने कहा कि संगम में स्नान केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि अंतरात्मा की संतृप्ति का मार्ग है। उन्होंने कहा, जब हृदय में क्षोभ और ग्लानि हो, तो जल की शीतलता भी अर्थहीन हो जाती है।