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बारामती प्लेन हादसा :मप्र से खास रिश्ता रहा है कैप्टन शांभवी पाठक का, ग्वालियर में की थी पढ़ाई, फ्लाइंग क्लब भी किया था जॉइन

बारामती प्लेन क्रैश में महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार के साथ पायलट कैप्टन सुमित और को-पायलट कैप्टन शांभवी पाठक की भी जिंदगी खत्म हो गई। कैप्टन शांभवी पाठक का मप्र से खास रिश्ता रहा है।
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मप्र से खास रिश्ता रहा है कैप्टन शांभवी पाठक का, ग्वालियर में की थी पढ़ाई, फ्लाइंग क्लब भी किया था जॉइन
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    भोपाल। पुणेबारामती में बुधवार सुबह हुए विमान हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस दर्दनाक दुर्घटना में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार सहित विमान में सवार सभी पांच लोगों की असामयिक मृत्यु हो गई। हादसा उस वक्त हुआ जब विमान लैंडिंग से कुछ ही मिनट पहले नियंत्रण खो बैठा। विमान की कमान वरिष्ठ पायलट कैप्टन सुमित कपूर के हाथों में थी, जबकि को-पायलट के रूप में कैप्टन शांभवी पाठक अपनी जिम्मेदारी निभा रही थीं। 

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    मध्यप्रदेश से गहरा जुड़ाव, ग्वालियर में देखे सपने 

    कैप्टन शांभवी पाठक का मध्यप्रदेश, विशेषकर ग्वालियर से गहरा और भावनात्मक रिश्ता रहा। उनकी स्कूली शिक्षा एयरफोर्स बाल भारती स्कूल, ग्वालियर में हुई, जहां वे वर्ष 2016 से 2018 तक पढ़ीं। यही वह दौर था जब अनुशासन, देशसेवा और उड़ान के प्रति उनका आकर्षण मजबूत हुआ। ग्वालियर की सैन्य और वायुसेना से जुड़ी संस्कृति ने उनके भीतर पायलट बनने के सपने को पंख दिए।

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    कम उम्र में बनाई खास पहचान

    इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद शांभवी ने मुंबई यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया और एयरोनॉटिक्स, एविएशन एवं एयरोस्पेस साइंस में बीएससी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने कमर्शियल पायलट बनने के लक्ष्य के साथ न्यूज़ीलैंड का रुख किया, जहां कड़ी ट्रेनिंग पूरी कर अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त पायलट लाइसेंस हासिल किया। भारत लौटने पर उन्होंने DGCA से कमर्शियल पायलट लाइसेंस और Frozen ATPL प्राप्त किया, जो किसी भी पायलट के करियर में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

    मध्यप्रदेश फ्लाइंग क्लब से जुड़ीं

    शांभवी का रिश्ता केवल पढ़ाई तक ही नहीं, बल्कि प्रोफेशनल स्तर पर भी मध्य प्रदेश से बना रहा। उन्होंने मध्य प्रदेश फ्लाइंग क्लब में असिस्टेंट फ्लाइट इंस्ट्रक्टर के रूप में सेवाएं दीं और कई नए पायलटों को प्रशिक्षण दिया। यह उनके तकनीकी कौशल के साथ-साथ जिम्मेदार और प्रेरक व्यक्तित्व को भी दर्शाता है।

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    प्रोफेशनल ट्रेनिंग और कॉर्पोरेट एविएशन में उड़ान

    उन्होंने स्पाइसजेट से एविएशन सिक्योरिटी ट्रेनिंग और जॉर्डन एयरलाइन ट्रेनिंग से A320 ओरिएंटेशन ट्रेनिंग प्राप्त की। अगस्त 2022 से वे VSR Ventures में फुल-टाइम फर्स्ट ऑफिसर के रूप में कार्यरत थीं। लियरजेट 45 जैसे हाई-परफॉर्मेंस बिज़नेस जेट को उड़ाने की जिम्मेदारी संभालना उनकी काबिलियत और भरोसे का प्रमाण था। वे विशेष रूप से VIP और चार्टर फ्लाइट्स का संचालन कर रही थीं। उन्हें 1500 घंटे का फ्लाइंग एक्सपीरियंस था। 

    पिता भी रहे हैं वायुसेना के पायलट

    शांभवी पाठक का पारिवारिक जुड़ाव ग्वालियर से आज भी बना हुआ है। उनकी दादी मीरा पाठक ग्वालियर में रहती हैं, जबकि माता-पिता वर्तमान में दिल्ली में निवास कर रहे हैं। शांभवी के पिता स्वयं पायलट रहे हैं और भारतीय वायुसेना में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। घर में आज भी शांभवी के बचपन की कई यादगार तस्वीरें सहेजकर रखी गई हैं। दादी मीरा पाठक के अनुसार, शांभवी को बचपन से ही फाइटर प्लेन के प्रति विशेष आकर्षण था, जिसकी सबसे बड़ी प्रेरणा उनके पिता का वायुसेना से जुड़ा जीवन रहा। 

    उड़ान से पहले दादी को भेजा था 'गुड मॉर्निंग' संदेश  

    शांभवी पाठक ने उड़ान भरने से पहले ग्वालियर में रह रहीं अपनी दादी मीरा पाठक को आखिरी संदेश 'गुड मॉर्निंग' भेजा था। ग्वालियर के बसंत विहार में रहने वाली शांभवी की दादी मीरा पाठक ने एजेंसी से बातचीत में कहा कि उनकी पोती ने यहां के एयरफोर्स स्टेशन में अपने पिता की तैनाती के दौरान एयरफोर्स विद्या भारती स्कूल से पांचवी कक्षा पास की थी और बाद में पिता के स्थानांतरण के बाद परिवार दिल्ली के लोधी कॉलोनी में रहने लगा। बुधवार की सुबह मुंबई में विमान में सवार होने से पहले शांभवी ने अपनी दादी को ग्वालियर में 'गुड मॉर्निंग' का संदेश भेजा था। मीरा पाठक ने बताया कि सुबह उसका संदेश देखकर वह हैरत में जरूर आईं, क्योंकि वह नियमित तैर पर संदेश नहीं भेजती थी। उन्होंने कहा कि करीब 11 बजे उनके छोटे बेटे ने फोन करके यह जानकारी दी थी कि जिस विमान दुर्घटना में अजित पवार की मौत हुई है, उसमें शांभवी भी थी। मीरा पाठक की पड़ोसी ऊषा उनियाल ने कहा कि शांभवी पढ़ने लिखने में बेहद होशियार और स्वभाव में थोड़ी चुलबुली थी। उन्होंने बताया कि वह कभी भी ग्वालियर आती तो अपनी दादी से मिलने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी। एक अन्य पड़ोसी ने बताया कि शांभवी 2024 में अपने दादा की मृत्यु और साल 2025 में 12 अक्टूबर को उनकी बरसी पर ग्वालियर आई थी। 

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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