भिंड में कलेक्टर के आदेश पर 2 साल से अमल नहीं, विवादित जमीन पर अब भी निजी गतिविधियां जारी
भिंड। औद्योगिक क्षेत्र मालनपुर में अवैध कॉलोनी के खिलाफ कलेक्टर का आदेश सरकारी फाइलों में कैद होकर रह गया है। जिस जमीन को जिला प्रशासन ने शासकीय प्रबंध में लेने का आदेश जारी किया था, वहां आज भी निजी गतिविधियां बेखौफ जारी होने की जानकारी सामने आई है।
वरुण इन्फ्राटेक के संचालक जीतू कबाड़ी उर्फ जितेंद्र नागवानी की सर्वे नंबर 264/1 और 264/2 की विवादित जमीन पर करीब 150 श्रमिकों को किराए पर रखा गया है। परिसर में पानी का फिल्टर प्लांट संचालित हो रहा है और पुरानी फैक्ट्री को तोड़ने का काम भी जारी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कलेक्टर ने जमीन शासकीय प्रबंध में लेने के आदेश दे दिए थे, तो फिर नगर परिषद मालनपुर आज तक मौके पर कब्जा लेने क्यों नहीं पहुंची? क्या अवैध कॉलोनाइजरों के आगे प्रशासन नतमस्तक है या फिर जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं?
अनुमति नहीं, फिर भी काट दिए प्लॉट
प्रशासनिक जांच में सामने आया था कि वरुण इन्फ्राटेक के संचालक जीतू कबाड़ी उर्फ जितेंद्र नागवानी पुत्र आशाराम नागवानी निवासी गार्डन होम्स, सिटी सेंटर ग्वालियर ने संबंधित जमीन के लिए नजूल अनापत्ति और कॉलोनाइजर पंजीयन तो प्राप्त कर लिया था, लेकिन कॉलोनी विकास की विधिवत अनुमति नहीं ली। इसके बावजूद जमीन को छोटे-छोटे भूखंडों में विभाजित कर प्लॉट काटने और बेचने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। मौके की स्थिति, फोटोग्राफ और खसरा अभिलेखों की जांच में अवैध कॉलोनी विकसित किए जाने की पुष्टि हुई थी।
तीन नोटिस भी बेअसर, 11 अक्टूबर को कलेक्टर का आदेश
प्रशासन ने संबंधित कॉलोनाइजर को अपना पक्ष रखने के लिए 10 जुलाई 2024, 8 अगस्त 2024 और 25 सितंबर 2024 को तीन बार समाचार पत्रों में सार्वजनिक सूचनाएं प्रकाशित कराईं। इसके बावजूद न तो कॉलोनी विकास की अनुमति ली गई और न ही कोई आवेदन प्रस्तुत किया गया। लगातार अवसर दिए जाने के बाद कलेक्टर ने 11 अक्टूबर 2024 को मध्यप्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1961 की धारा 339-ग के तहत सर्वे नंबर 264/1 और 264/2 की भूमि शासकीय प्रबंध में लेने का आदेश जारी कर दिया।
कलेक्टर ने दिए निर्देश, नगर परिषद ने नहीं की कार्रवाई
आदेश में मुख्य नगर पालिका अधिकारी नगर परिषद मालनपुर को संबंधित भूमि के सुनियोजित विकास के लिए विकास योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए थे। उप पंजीयक गोहद को दोनों सर्वे नंबरों पर किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री अथवा विक्रय पत्र निष्पादित नहीं करने के लिए स्पष्ट निर्देशित किया गया था। आदेश की प्रतिलिपि एसडीएम गोहद और अधीक्षक भू-अभिलेख को भी भेजी गई थी। इसके बावजूद मौके पर कब्जा लेने की कार्रवाई नहीं होना नगर परिषद की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा करता है।
सरकारी आदेश के बाद भी निजी कारोबार कैसे?
एक तरफ कलेक्टर का आदेश, दूसरी तरफ उसी परिसर में करीब 150 श्रमिकों को किराए पर रखने, पानी का फिल्टर प्लांट चलाने और पुरानी फैक्ट्री तोड़ने की गतिविधियां। आखिर यह सब किसकी अनुमति से हो रहा है? क्या नगर परिषद ने कभी मौके पर जाकर जांच की? यदि जांच की तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि नहीं की तो दो साल तक जिम्मेदार अधिकारी क्या करते रहे? कलेक्टर के आदेश के बावजूद निजी गतिविधियों का जारी रहना प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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अधिकारी बोले- फाइल देखकर ही बता पाएंगे
मामले में नगर परिषद मालनपुर के मुख्य नगर पालिका अधिकारी रिहान अली जैदी से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा, "अभी मैं भोपाल में हूं। दो साल पुराना मामला है, फाइल देखकर ही बता पाऊंगा।" वहीं एकेवीएन मालनपुर की मैनेजर प्रज्ञा राजपूत ने कहा, "नगर परिषद से संबंधित आदेश है, इस संबंध में नगर परिषद के अधिकारी ही बताएंगे।"
कब जागेगा प्रशासन, किसकी तय होगी जवाबदेही?
यह मामला सिर्फ अवैध कॉलोनी का नहीं, बल्कि जिला प्रशासन के आदेशों के पालन का भी है। जब कलेक्टर के आदेश के बाद भी संबंधित जमीन पर कब्जा नहीं लिया गया और निजी गतिविधियां जारी हैं, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
क्या कलेक्टर इस मामले में नगर परिषद से जवाब तलब करेंगे? क्या मौके का निरीक्षण कराकर जमीन की वास्तविक स्थिति और जारी गतिविधियों की जांच होगी? सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रशासन का आदेश जमीन पर कब उतरेगा, या फिर अवैध कॉलोनाइजरों के सामने सरकारी तंत्र यूं ही बेबस बना रहेगा?






















