‘मांस खाने वाले पाखंडी’! बागेश्वर बाबा के बयान से बंगाल में बवाल, कांग्रेस ने मांगी गिरफ्तारी, जानिए पूरा विवाद

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। बागेश्वर धाम के प्रमुख पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के एक बयान के बाद राजनीतिक दल आमने-सामने आ गए हैं। शास्त्री ने हावड़ा के लिलुआ में आयोजित हनुमंत कथा के दौरान दुर्गा पूजा पंडालों के आसपास मांसाहारी खाना बनाने और खाने पर सवाल उठाए थे। उनके बयान का वीडियो सामने आने के बाद बंगाल में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गईं। पश्चिम बंगाल कांग्रेस ने उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए कार्रवाई और गिरफ्तारी की मांग की है। वहीं, सत्तारूढ़ दल से जुड़े नेताओं ने भी उनके बयान पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, बीजेपी की प्रदेश इकाई ने इस बयान से दूरी बनाते हुए इसे शास्त्री की निजी राय बताया है। आखिर ऐसा क्या कहा गया कि बंगाल में विवाद खड़ा हो गया? और दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन का बंगाली संस्कृति से क्या संबंध है? आइए पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं।
सबसे पहले जानिए विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
हावड़ा जिले के लिलुआ में तीन दिवसीय हनुमंत कथा का आयोजन किया गया था। इसी कार्यक्रम में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने दुर्गा पूजा और नवरात्रि के दौरान पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन को लेकर टिप्पणी की। शास्त्री ने धार्मिक आयोजनों के दौरान मांसाहारी भोजन को अनुचित बताते हुए लोगों से ऐसे लोगों का विरोध करने की अपील की। उन्होंने धार्मिक अवसरों पर मांस खाने वालों को लेकर भी आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद बंगाल में कई लोगों ने इसे स्थानीय धार्मिक परंपराओं और खान-पान की संस्कृति में दखल के तौर पर देखा।
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बागेश्वर बाबा के खिलाफ FIR की मांग
बयान सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल कांग्रेस ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की मांग की। दक्षिण कोलकाता जिला कांग्रेस की ओर से भवानीपुर थाने में शिकायत दी गई। कांग्रेस का आरोप है कि शास्त्री की टिप्पणी से बंगाली समाज की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं और इससे सामाजिक तनाव पैदा हो सकता है। पार्टी ने पुलिस से शिकायत दर्ज कर आवश्यक कार्रवाई और गिरफ्तारी की मांग की। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने थाने के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया। इसके अलावा पुलिस मुख्यालय लालबाजार समेत दूसरे थानों में भी शिकायतें भेजे जाने की बात सामने आई है।
बंगाल की राजनीति में क्यों गरमा गया मामला?
इस विवाद ने केवल धार्मिक बहस का रूप नहीं लिया, बल्कि राजनीतिक रंग भी ले लिया है। तृणमूल कांग्रेस ने शास्त्री के बयान की आलोचना करते हुए इसे बंगाली संस्कृति और परंपराओं का अपमान बताया। TMC नेताओं का कहना है कि बंगाल में लोग अपनी पारंपरिक खान-पान की आदतों और धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार त्योहार मनाते हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि बीजेपी से जुड़े कुछ लोग बंगाल की थाली और संस्कृति को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। यानी विवाद सिर्फ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति मांस खाए या नहीं। मामला अब इस सवाल से जुड़ गया है कि क्या किसी दूसरे राज्य या क्षेत्र की धार्मिक सोच बंगाल की स्थानीय परंपराओं पर लागू की जा सकती है?
बीजेपी ने बयान से बनाई दूरी
विवाद बढ़ने के बाद पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने भी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान से दूरी बना ली। उन्होंने कहा कि बंगाल में मछली और मांस खाना पारंपरिक खान-पान का हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति बंगाल की इस परंपरा को बदलने की कोशिश करता है तो यह संवेदनशील मामला बन सकता है। बीजेपी नेता ने शास्त्री के बयान को उनकी व्यक्तिगत राय बताया। इससे साफ है कि बीजेपी की राज्य इकाई इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से बड़ा विवाद बनने से रोकना चाहती है।
मंत्री दिलीप घोष ने क्या कहा?
बंगाल के मंत्री दिलीप घोष की प्रतिक्रिया भी सामने आई। उन्होंने कहा कि दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार करना बंगाल में कोई नया या विवादित विषय नहीं है। उनका कहना था कि बंगाल में दुर्गा पूजा से जुड़ी कुछ परंपराओं में बकरे की बलि और उसके बाद मांस को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा रही है। इसलिए किसी व्यक्ति के मांसाहार करने को लेकर विवाद खड़ा करना उचित नहीं है। दिलीप घोष ने यह भी कहा कि हर व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार खाना खाने की आजादी होनी चाहिए। उन्होंने शास्त्री के बयान को उनकी निजी सोच बताते हुए कहा कि संत अपने नजरिए से बात करते हैं और लोग अपनी इच्छा के अनुसार उसे मान सकते हैं।
बंगाल में दुर्गा पूजा बड़ा सांस्कृतिक उत्सव
इस पूरे विवाद को समझने के लिए बंगाल की दुर्गा पूजा की परंपरा को समझना जरूरी है। बंगाल में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह एक बड़ा सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। परिवार, रिश्तेदार और दोस्त इस दौरान एक-दूसरे से मिलते हैं। नए कपड़े पहनना, पंडाल घूमना और अलग-अलग तरह के पकवान खाना इस उत्सव का हिस्सा है। यही वजह है कि बंगाल में दुर्गा पूजा को सिर्फ व्रत या सात्विक भोजन से जोड़कर देखना कई लोगों को स्थानीय परंपरा से अलग नजर आता है।
शाक्त परंपरा में खान-पान का अलग महत्व
बंगाल में शक्ति उपासना यानी शाक्त परंपरा का लंबा इतिहास रहा है। अलग-अलग मंदिरों और परिवारों में पूजा-पद्धतियां भी अलग हो सकती हैं। कुछ परंपराओं में देवी को अलग-अलग प्रकार के भोग चढ़ाए जाते हैं। कुछ स्थानों पर मांसाहारी भोग या बलि की परंपरा भी देखने को मिलती है। हालांकि यह हर पूजा पंडाल या हर परिवार की परंपरा नहीं है। यही विविधता बंगाल की धार्मिक संस्कृति को अलग पहचान देती है।
मछली को शुभ क्यों माना जाता है?
बंगाली संस्कृति में मछली का महत्व केवल खाने तक सीमित नहीं है। कई पारंपरिक मान्यताओं में मछली को शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण बंगाली परिवारों में कई शुभ अवसरों पर मछली का इस्तेमाल किया जाता है। दुर्गा पूजा के दौरान भी कई परिवार अपनी पारंपरिक भोजन व्यवस्था के अनुसार मछली और दूसरे व्यंजन बनाते हैं। हालांकि हर परिवार की अपनी परंपरा होती है और सभी लोग एक जैसा भोजन नहीं करते।
विवाद में VHP का बयान भी चर्चा में
इस विवाद से पहले विश्व हिंदू परिषद यानी VHP की ओर से भी दुर्गा पूजा पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन से दूरी रखने की बात कही गई थी। इसके बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान ने इस मुद्दे को और चर्चा में ला दिया। अब सवाल यह है कि धार्मिक आयोजनों के आसपास खान-पान को लेकर नियम किस आधार पर तय किए जाएं और क्या ऐसी अपील स्थानीय संस्कृति को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए?
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सरकार और बागेश्वर बाबा के बीच एक दिलचस्प पहलू
इस विवाद का एक और पहलू भी सामने आया है। लिलुआ कार्यक्रम से पहले धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के लिए राज्य सरकार से जुड़े एक कार्यक्रम स्थल पर डिनर आयोजित किए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसमें कुछ मंत्री भी शामिल हुए थे। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से सोशल मीडिया पर शास्त्री की तस्वीरें साझा कर उन्हें ‘बागेश्वर महाराज’ के नाम से संबोधित किए जाने की बात भी सामने आई। यही वजह है कि अब उनके बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और भी ज्यादा चर्चा में हैं।
आखिर विवाद की असली वजह क्या है?
पूरे मामले को देखें तो विवाद सिर्फ मांसाहार बनाम शाकाहार का नहीं है। इसके पीछे धर्म, स्थानीय संस्कृति, खान-पान की आजादी और राजनीति जैसे कई मुद्दे जुड़े हैं। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने धार्मिक नजरिए से मांसाहार को लेकर अपनी बात रखी। कांग्रेस ने इसे बंगाली समाज की धार्मिक भावनाओं से जोड़ते हुए पुलिस कार्रवाई की मांग की। TMC ने इसे बंगाली संस्कृति में दखल बताया, जबकि बीजेपी की प्रदेश इकाई ने शास्त्री के बयान से दूरी बनाकर इसे उनकी निजी राय बताया।
अब देखना होगा कि पुलिस शिकायत पर आगे क्या कार्रवाई होती है और क्या यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता है।



















