Naresh Bhagoria
4 Feb 2026
पल्लवी वाघेला, भोपाल। 'दिनभर स्कूल में बैठे रहो, फिर घर पहुंचे तो कुछ ही देर में ट्यूशन क्लासेस का टाइम हो जाता है। इस बार एग्जाम फरवरी में ही खत्म हो रहे हैं तो मम्मी-पापा ने अभी से हॉबी क्लासेस में सीट बुक कर दी है, ताकि मैं वहां बिजी रहूं और उन्हें कोई टेंशन नहीं रहे। मुझे ये अच्छा नहीं लगता। इसलिए घर छोड़कर जा रहा था।' यह बात भोपाल के 9 वर्षीय बच्चे ने CWC की काउंसलिंग में कही। बच्चे को शनिवार को आगरा स्टेशन के पास रेस्क्यू किया गया था। यह इकलौता मामला नहीं है। बीते साल भोपाल शहर में रेस्क्यू किए बच्चों में भी 13 बच्चों ने इसी वजह से अपना घर छोड़ा था। उन्होंने कहा था कि उन्हें माता-पिता का अटेंशन चाहिए।
इस मामले में नर्मदापुरम रोड के रहवासी माता-पिता ने बताया कि पिता अपने जॉब और मां अपने फैशन डिजाइनिंग के बिजनेस के चलते देर रात तक ही घर आ पाते हैं। उन्होंने कहा कि हम क्या करें? बच्चा छोटा था, तो घर में नैनी रखी थी, वह भी बच्चे का खास ध्यान नहीं रखती थी। इस बार क्योंकि परीक्षाएं फरवरी के दूसरे हफ्ते तक खत्म हो रही हैं तो हॉबी क्लासेस जॉइन कराना मजबूरी है।
बीते साल मई माह में इंदौर की 11 साल की बच्ची को भोपाल में रेस्क्यू किया गया था। उसने बताया कि माता-पिता के पास उसके लिए समय नहीं है। वहीं, माता-पिता ने कहा कि वो बच्ची की हर डिमांड पूरी करते हैं। संडे को उसे मॉल ले जाते हैं और खुद नहीं जा पाते तो हाउस हेल्पर के साथ उसे शॉपिंग के लिए भेजते हैं।
भोपाल के ही एक सात साल के बच्चे को बीते साल जनवरी में रेस्क्यू किया गया था। उसने कहा कि जब वह मम्मी-पापा के साथ रहना चाहता है, वो लोग उसके लिए कोई गैजेट ला देते हैं। बाकी समय उसे क्लासेस में बिजी रखते हैं ताकि उन्हें अपना समय नहीं देना पड़े। बच्चे ने कहा कि उसे लगता है जैसे वह पैरेंट्स के लिए बोझ है।
माता-पिता और बच्चों के बीच पारस्परिक कम्युनिकेशन की कमी हो रही है। इसके साथ ही बच्चों में सामाजिक-भावनात्मक कठिनाइयां भी पैदा हो रही हैं। इसके परिणाम अलग-अलग उम्र के बच्चों में अलग-अलग तरह से नजर आ रहे हैं। इतनी छोटी उम्र के बच्चे को जिंदगी परेशानी लगना सही संकेत नहीं है। दरअसल, बच्चों को माता-पिता के क्वालिटी टाइम की जरूरत होती है।
दिव्या दुबे मिश्रा, काउंसलर