केचप कभी दवा था, 1830 के दशक में टमाटर को कहा जाता था चमत्कारी इलाज

न्यूयॉर्क। हर चीज पर केचप डालने वालों के लिए कई लोगों ने तो यही सोचा होगा कि ऐसे लोगों को किसी दवा की जरूरत है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 1830 के दशक में टमाटर को असल में एक दवा के तौर पर पेश किया जाता था। यहां तक कि लोगों को इसे केचप के रूप में खाने की सलाह भी दी जाती थी। चाहे आप विश्वास करें या न करें, एक समय ऐसा भी था जब टमाटर सिर्फ रसोई की कोई आम सामग्री नहीं, बल्कि कई स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज के रूप में जाने जाते थे। 1830 के दशक में एक अमेरिकी डॉक्टर ने टमाटर के बारे में कुछ बहुत ही अनोखे दावे किए। उन्होंने बताया कि यह अपच और दस्त जैसी पाचन संबंधी समस्याओं को ठीक करने में मदद कर सकता है।
एक अजीब सा मेडिकल क्रेज शुरू हो गया
डॉक्टर के दावे के बाद टमाटर के अर्क से गोलियां बनाई जाने लगीं और पूरे देश में बेची जाने लगीं। एक आम सी सब्जी अचानक एक 'चमत्कारी दवा' बन गई और देखते ही देखते कई कंपनियां इससे अपना कारोबार चलाने लगीं। इसकी शुरुआत एक ऐसे डॉक्टर से हुई जिन्हें शायद अपने पिज्जा पर केचप कुछ ज्यादा ही पसंद था। उस समय के डॉ. जॉन कुक बेनेट का मानना था कि टमाटर में औषधीय गुण होते हैं और यह पाचन से जुड़ी कई समस्याओं के इलाज में मददगार हो सकता है। बेनेट सिर्फ लोगों को ज्यादा सब्जियां खाने की सलाह नहीं दे रहे थे। उनका मानना था कि टमाटर में अद्भुत औषधीय गुण होते हैं। ऐसे समय में जब चिकित्सा विज्ञान अभी विकसित हो रहा था और कई आम बीमारियों के इलाज के विकल्प सीमित थे, तब इस तरह के दावों ने लोगों का काफी ध्यान खींचा।
टमाटर को अलग-अलग तरह से खाने की सलाह
डॉक्टर ने टमाटर को अलग-अलग रूपों में खाने की सलाह दी - चाहे वह कच्चा हो, पका हुआ हो या 'कैटसप' के रूप में हो, जिसे आज हम आम तौर पर 'केचप' कहते हैं। उनके ये दावे जल्द ही चिकित्सा जगत से बाहर भी फैलने लगे और लोग टमाटर को सिर्फ रसोई की एक आम सामग्री से कहीं बढ़कर देखने लगे। लेकिन असली मोड़ तब आया जब कुछ उद्यमियों ने बेनेट के दावों में एक मौका देखा। लोगों को ज्यादा टमाटर खाने के लिए कहने के बजाय उन्होंने कुछ ऐसा बेचना शुरू किया जो बिल्कुल किसी आम दवा जैसा दिखता था - टमाटर के अर्क से बनी गोलियां। टमाटर की गोलियां अमेरिका में चिकित्सा से जुड़ा नया क्रेज बन गईं।




















