यूरोप के गोला-बारूद संकट से भारत को बड़ा फायदा- रक्षा निर्यात 62.66% बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर

नई दिल्ली। यूक्रेन को लगातार तोप के गोले भेजने के बाद यूरोपीय देशों के पास गोला-बारूद का स्टॉक काफी घट गया है। अब वे अपने भंडारों को दोबारा भरने के लिए तेजी से खरीदारी कर रहे हैं। लेकिन इस तेज मांग के सामने यूरोप की रक्षा कंपनियां उत्पादन बढ़ाने में पिछड़ रही हैं। यही कमजोरी भारत जैसे किफायती और भरोसेमंद निर्माताओं के लिए बड़ा अवसर बन गई है।
800 अरब यूरो की रीआर्म यूरोप योजना
यूरोपीय संघ की 'रीआर्म यूरोप' यानी 'रेडिनेस 2030' पहल ने इस खरीद को और तेज कर दिया है। यह 800 अरब यूरो की महत्वाकांक्षी योजना है। इसका मकसद रक्षा खर्च बढ़ाना, सैन्य ताकत को मजबूत करना और पूरे यूरोप में रक्षा उद्योग का विस्तार करना है।
भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर
रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। पिछले साल यह आंकड़ा 23,622 करोड़ रुपये था। इस तरह इसमें 62.66% की वृद्धि दर्ज की गई है। इस कुल निर्यात में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSUs) का योगदान 21,071 करोड़ रुपये रहा जो कुल का 54.84% है। वहीं निजी कंपनियों ने 17,353 करोड़ रुपये का निर्यात किया।
पांच साल में तीन गुना हुआ निर्यात
भारत का रक्षा निर्यात पिछले पांच वर्षों में लगभग तीन गुना हो गया है। अब देश 80 से अधिक बाजारों में रक्षा उत्पादों की आपूर्ति कर रहा है। पंजीकृत निर्यातकों की संख्या भी 128 से बढ़कर 145 हो गई है। रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इस तेजी के पीछे बेहतर ऑनलाइन पोर्टल और निर्यात अनुमति के लिए सरल बनाई गई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) की भी अहम भूमिका है।
यूरोप को हथियार देने में भारत तीसरे नंबर पर
पिछले महीने के अंत में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा कि भारत यूरोप को हथियार निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है। इसका मुख्य श्रेय 'रीआर्म यूरोप' पहल को जाता है। वे एक दिन पहले प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट का जिक्र कर रहे थे। सिंह ने बताया कि भारत अब यूरोपीय देशों को विभिन्न कैलिबर के मानक गोला-बारूद और आर्टिलरी शेल बड़ी मात्रा में निर्यात कर रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि नई दिल्ली स्थानीय कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यमों के जरिए यूरोपीय खरीद कार्यक्रमों में और सीधे तौर पर शामिल होना चाहती है। उन्होंने इस बात की ओर भी इशारा किया कि भारत अपने मुख्य रक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में रूस पर निर्भरता धीरे-धीरे कम कर रहा है।
पिछले कुछ सालों की तुलना
इस बदलाव की असली तस्वीर एक हालिया रिपोर्ट से सामने आती है। रिपोर्ट के अनुसार यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद के चार सालों में भारतीय कंपनियों ने यूरोप को कम से कम 872 मिलियन डॉलर के गोला-बारूद से जुड़े उत्पादों की आपूर्ति की है। इससे पहले के चार सालों में यह आंकड़ा सिर्फ 49.2 मिलियन डॉलर था। यानी इसमें 1,600% से भी ज्यादा की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इनमें से करीब तीन-चौथाई निर्यात मध्य और पूर्वी यूरोप के 13 देशों को किया गया। इन बाजारों में भारत 28वें स्थान से छलांग लगाकर दक्षिण कोरिया के बाद दूसरा सबसे बड़ा विदेशी आपूर्तिकर्ता बन गया है। हालांकि, यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। यह रैंकिंग उन देशों में गोला-बारूद की कुछ खास श्रेणियों तक ही सीमित है। इसका यह मतलब नहीं है कि भारत यूरोप में प्रमुख पारंपरिक हथियारों का मुख्य आपूर्तिकर्ता बन गया है।




















