देश का अनोखा गांव! जहां 100 साल से दिवाली पर नहीं जलते पटाखे, जानिए खास वजह

दिवाली का त्योहार आते ही हर तरफ रोशनी और आतिशबाजी देखने को मिलती है। लोग घरों को दीयों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाते हैं। बच्चे पटाखे जलाते हैं तो कई लोग आसमान में रॉकेट और फुलझड़ियां छोड़कर त्योहार का जश्न मनाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा गांव भी है, जहां पिछले करीब 100 सालों से दिवाली पर पटाखे नहीं जलाए जाते? यहां के लोग बिना आतिशबाजी के ही दिवाली मनाते हैं। इसकी वजह कोई सरकारी नियम नहीं, बल्कि गांव के पेड़ों पर रहने वाले सैकड़ों चमगादड़ हैं। तमिलनाडु के मयिलादुथुरई जिले में स्थित पेरम्बूर गांव के लोगों ने इन बेजुबान जीवों की सुरक्षा के लिए एक अनोखी परंपरा बना रखी है। यहां के लोग अपनी खुशी के लिए चमगादड़ों के घर को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। यही वजह है कि गांव में दिवाली के दौरान पटाखों से दूरी रखी जाती है।
100 साल से पटाखों से दूर है ये गांव
पेरम्बूर गांव में स्थित 'वव्वाल थोप्पू' यानी चमगादड़ों का बाग इस अनोखी परंपरा की सबसे बड़ी वजह है। यहां करीब 150 साल पुराना एक विशाल बरगद का पेड़ है, जिस पर सैकड़ों चमगादड़ रहते हैं। ये चमगादड़ इसी पेड़ को अपना घर मानते हैं। गांव के लोगों का मानना है कि दिवाली के दौरान पटाखों से निकलने वाला तेज शोर और धुआं इन जीवों के लिए परेशानी पैदा कर सकता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए ग्रामीणों ने कई पीढ़ियों से दिवाली पर पटाखे नहीं जलाने का फैसला किया है। इस गांव में त्योहार की रौनक कम नहीं होती। लोग घरों में दीये जलाते हैं, रंगोली बनाते हैं और मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। बस यहां दिवाली के जश्न में पटाखों और आतिशबाजी की जगह दीयों की रोशनी को खास महत्व दिया जाता है।
चमगादड़ों के लिए गांव वालों ने बदली दिवाली मनाने की परंपरा
आमतौर पर त्योहारों के दौरान लोग अपनी खुशी जाहिर करने के लिए आतिशबाजी करते हैं। लेकिन पेरम्बूर के लोगों ने यह समझा है कि उनकी कुछ देर की खुशी से पेड़ों पर रहने वाले बेजुबान जीवों को परेशानी हो सकती है। पटाखों की तेज आवाज और उनसे निकलने वाला धुआं चमगादड़ों के रहने के माहौल को प्रभावित कर सकता है। चमगादड़ दिन में पेड़ों पर आराम करते हैं और रात में भोजन की तलाश में बाहर निकलते हैं। ऐसे में तेज आवाज और धुएं से उनके सामान्य व्यवहार पर असर पड़ने की आशंका रहती है। गांव वालों ने इन जीवों को सुरक्षित रखने के लिए अपनी दिवाली मनाने का तरीका ही बदल दिया। खास बात यह है कि यह परंपरा किसी एक साल या किसी एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही है। इस बार भी गांव में पटाखे नहीं जलाए जाएंगे।
पर्यावरण के लिए भी बेहद जरूरी हैं चमगादड़
चमगादड़ सिर्फ रात में उड़ने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण को संतुलित रखने में भी इनकी अहम भूमिका होती है। कई तरह के चमगादड़ फलों को खाते हैं और उनके बीज अलग-अलग जगहों तक पहुंचाते हैं। इससे नए पेड़-पौधे उगने और जंगलों के विस्तार में मदद मिलती है। इसके अलावा कुछ चमगादड़ फूलों का रस पीते हैं और एक फूल से दूसरे फूल तक पराग पहुंचाने में मदद करते हैं। इस प्रक्रिया को परागण कहा जाता है। इससे पौधों और पेड़ों के बढ़ने में सहायता मिलती है। चमगादड़ दिन के समय पेड़ों, गुफाओं और दूसरी सुरक्षित जगहों पर आराम करते हैं। रात होने पर वे भोजन की तलाश में निकलते हैं। इसलिए उनके रहने की जगह और आसपास का शांत वातावरण उनके लिए काफी जरूरी होता है।
तमिलनाडु के दूसरे गांवों में भी दिखती है ऐसी समझदारी
पेरम्बूर अकेला ऐसा गांव नहीं है, जहां लोग बेजुबान जीवों की सुरक्षा के लिए दिवाली पर पटाखे नहीं जलाते। तमिलनाडु के कझुपेरुम्पक्कम और किट्टमपालयम जैसे गांवों में भी ऐसी संवेदनशीलता देखने को मिलती है। इन गांवों के लोगों ने यह दिखाया है कि त्योहार मनाने के लिए हमेशा तेज आवाज और आतिशबाजी जरूरी नहीं होती। दीये जलाकर, पूजा करके और परिवार के साथ समय बिताकर भी दिवाली को खास बनाया जा सकता है। पेरम्बूर गांव की यह परंपरा हमें एक अच्छी सीख देती है कि त्योहारों की खुशियां सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हमारे आसपास रहने वाले पशु-पक्षियों और दूसरे जीवों का भी ध्यान रखना जरूरी है। गांव वालों की यह छोटी-सी कोशिश पर्यावरण और वन्यजीवों के प्रति बड़ी जिम्मेदारी का उदाहरण है।




















