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राष्ट्रीय गीत :वंदे मातरम की 150 वीं वर्षगांठ आज, बिहार में कौन भुना रहा सियासत की चाल

वंदे मातरम की 150 वीं वर्षगांठ आज, बिहार में कौन भुना रहा सियासत की चाल
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    नई दिल्ली। राष्ट्रगीत वंदे मातरम आज अपनी '150 वीं' वर्षगांठ मना रहा है। इस खास अवसर पर देशभर में शुक्रवार को कई जगह धूमधाम से कार्यक्रम आयोजित होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मौके पर दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी स्टेडियम में शामिल होंगे। दूसरी और यह ऐसे समय पर मनाया जा रहा जहां बिहार विधानसभा चुनाव में पहले चरण की वोटिंग हो चुकी है। भाजपा ने इस मौके को 'राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक एकता' का प्रतीक बताया है वहीं महागठबंधन ने 'चुनावी भावनात्मक कार्ड' करार दिया है। 

    इस उपलक्ष्य में केंद्र सरकार ने देश के 150 अलग- अलग स्थानों पर आयोजन का फैसला लिया है। इसके तहत सामूहिक रूप से वंदे मातरम गाया जाएगा। 

    PM जारी करेंगे डाक टिकट और सिक्का 

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में राष्ट्रीय गीत "वंदे मातरम" के एक साल तक चलने वाले स्मरणोत्सव का उद्घाटन करेंगे। इसमें वे एक स्मारक डाक टिकट और सिक्का भी जारी करेंगे। यह कार्यक्रम 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया जा रहा है। 

    बिहार में तेज हुई "भावनात्मक कार्ड" की जंग 

    राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बिहार जैसे भावनात्मक रूप से संवेदनशील राज्य में राष्ट्रभक्ति का मुद्दा ग्रामीण और पारंपरिक वोट बैंक पर गहरा असर डाल सकता है। भाजपा इससे अपने कोर समर्थक वर्ग को फिर से एकजुट करने की कोशिश में है, वहीं विपक्षी दल अपने सामाजिक समीकरण और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर वोटरों को साधने में जुटी हुई हैं। ऐसे में ‘वंदे मातरम’ की यह गूंज वोटों के समीकरण को बदल सकती है। क्योंकि बिहार में भावनाएं अक्सर नतीजों से गहरी जुड़ी होती हैं।

    राष्ट्रगीत बना नया चुनावी मुद्दा?

    एक तरह बीजेपी इसे “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के प्रतीक के रूप में प्रचारित कर रही है। नेताओं की सभाओं में अब “वंदे मातरम” के जयघोष के साथ मंच सजने लगे हैं। वहीं, महागठबंधन का कहना है कि “वंदे मातरम हमारी साझा धरोहर है, लेकिन इसे वोट बटोरने के लिए हथियार न बनाया जाए। दिलचस्प यह है कि पहली बार बिहार के चुनावी मंच पर राष्ट्रगीत को लेकर सीधी बहस देखने को मिल रही है क्या भावनाएं अब रणनीति बन चुकी हैं?

    7 नवंबर एक ऐतिहासिक तारीख 

    वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा की गई थी। यह पहली बार 7 नवंबर, साल 1875 को साहित्यिक पत्रिका "बंगदर्शन" में प्रकाशित हुआ था। बाद में बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे अपने अमर उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया जो 1882 में प्रकाशित हुआ था।

    Aakash Waghmare
    By Aakash Waghmare

    आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...

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