रूस से तेल खरीदने वालों पर 100% टैरिफ का दबाव, फिर यूरेनियम पर अमेरिका ने क्यों छोड़ी गुंजाइश?

वॉशिंगटन। अमेरिका और रूस के बीच तनाव के बीच वॉशिंगटन ने मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 262-159 वोट से मंजूरी दी है। बिल में रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को देने का प्रावधान है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदार इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, इसी बिल में रूसी यूरेनियम और कुछ नागरिक परमाणु गतिविधियों से जुड़े मौजूदा अपवादों को बनाए रखने की व्यवस्था भी है।
रूस से तेल खरीदने वालों पर बढ़ेगा दबाव
अमेरिका में रूस पर नए आर्थिक दबाव की तैयारी तेज हो गई है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर 2026 को रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाले एक बड़े बिल को 262-159 वोट से मंजूरी दी। अब यह बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही यह कानून बनेगा। इस बिल का एक अहम हिस्सा उन देशों से जुड़ा है जो रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। प्रस्ताव के तहत ऐसे देशों के सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति राष्ट्रपति को मिल सकती है। इसका असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ सकता है, क्योंकि दोनों रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदते हैं। हालांकि, टैरिफ लगाना हर मामले में अपने आप लागू नहीं होगा, बल्कि राष्ट्रपति को इसके इस्तेमाल की शक्ति दी जा रही है।
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भारत और चीन पर क्यों है नजर?
रूस की तेल बिक्री से होने वाली कमाई को अमेरिका मॉस्को की युद्ध क्षमता के लिए महत्वपूर्ण मानता है। इसी वजह से नया बिल रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले दूसरे देशों पर भी आर्थिक दबाव बनाने का रास्ता खोलता है। भारत के लिए यह मुद्दा खास महत्व रखता है, क्योंकि रूस लंबे समय से भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल का प्रमुख स्रोत रहा है। अगर भविष्य में अमेरिका इस प्रावधान का इस्तेमाल करता है, तो भारतीय कंपनियों और अमेरिका को होने वाले निर्यात पर असर पड़ने की संभावना पर नजर रखनी होगी। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत पर वास्तव में 100% टैरिफ लगाया जाएगा।
यूरेनियम को लेकर क्या है खास प्रावधान?
यहीं इस बिल का परमाणु वाला हिस्सा महत्वपूर्ण हो जाता है। रूस पर ऊर्जा क्षेत्र में दबाव बढ़ाने के बावजूद अमेरिकी परमाणु जरूरतों से जुड़े कुछ रास्ते पूरी तरह बंद नहीं किए गए हैं। बिल में रूसी यूरेनियम पर मौजूदा अमेरिकी प्रतिबंधों को लागू करने की बात है। इसमें रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम और उससे जुड़ी कंपनियां भी शामिल हैं। लेकिन नागरिक परमाणु सहयोग से जुड़ी कुछ गतिविधियों और परमाणु रिएक्टरों के लिए कुछ कम-संवर्धित यूरेनियम आयात को मौजूदा अमेरिकी कानून के तहत अपवाद मिल सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने रूस से यूरेनियम खरीदने के लिए खुली छूट दे दी है। असल स्थिति मौजूदा अमेरिकी कानूनों, लाइसेंस और संबंधित अपवादों पर निर्भर करती है।
अमेरिका की परमाणु जरूरत भी है बड़ा कारण
अमेरिकी परमाणु बिजली उद्योग के लिए यूरेनियम और परमाणु ईंधन की लगातार सप्लाई जरूरी है। इसलिए रूस के खिलाफ प्रतिबंध बनाते समय परमाणु क्षेत्र में पूरी तरह कारोबार रोकने से अमेरिका की अपनी ऊर्जा जरूरतों पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि नए प्रतिबंधों में नागरिक परमाणु सहयोग और कुछ खास परमाणु ईंधन से जुड़े मामलों के लिए कानूनी रास्ते बनाए रखे गए हैं। इसे रूस के प्रति नरमी के बजाय अमेरिकी परमाणु ईंधन व्यवस्था की जरूरत के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।
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सीनेट के बाद हाउस से भी मिली मंजूरी
इस बिल को अमेरिकी सीनेट पहले ही 86-11 वोट से मंजूरी दे चुकी थी। इसके बाद हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी इसे बहुमत मिला। हाउस में 262 सदस्यों ने इसके पक्ष में और 159 ने विरोध में मतदान किया। अब अगला महत्वपूर्ण कदम राष्ट्रपति की मंजूरी है। बिल को लेकर अमेरिका में भी बहस है। कुछ सांसदों ने चिंता जताई है कि राष्ट्रपति को इतने बड़े टैरिफ अधिकार देने से अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त लागत का असर पड़ सकता है। वहीं, समर्थकों का कहना है कि इससे रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने में मदद मिल सकती है।




















