रोबोट नहीं, अब कॉकरोच बचाएंगे जान! वैज्ञानिकों ने बनाया खास साइबॉर्ग सिस्टम

आपदा के दौरान मलबे में फंसे लोगों तक पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती होती है। कई बार इंसानों और बड़े रेस्क्यू उपकरणों के लिए वहां पहुंचना मुश्किल हो जाता है। इसी समस्या को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने ऐसा साइबॉर्ग कॉकरोच तैयार किया है, जो छोटी-छोटी जगहों से गुजरकर फंसे लोगों को खोज सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें जरूरी दवा भी दे सकता है।
क्या है साइबॉर्ग कॉकरोच?
ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड और यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स की रिसर्च टीम ने Paraborg नाम का एक खास सिस्टम तैयार किया है। यह एक तरह का साइबॉर्ग कीट है, यानी इसमें जीवित कॉकरोच के साथ इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगाए गए हैं। इसका इस्तेमाल खास तौर पर प्राकृतिक आपदा के दौरान खोज और बचाव के काम में करने की योजना है।
कॉकरोच को ही क्यों चुना?
शोधकर्ताओं ने इसके लिए उत्तरी क्वींसलैंड में पाए जाने वाले एक बड़े कॉकरोच का इस्तेमाल किया। यह करीब 3.5 इंच लंबा और 40 ग्राम तक वजन वाला होता है। कॉकरोच के छोटे आकार और कम जगह में आसानी से चल पाने की क्षमता को देखते हुए इसे रेस्क्यू सिस्टम के लिए इस्तेमाल किया गया। वैज्ञानिकों ने इसके आधार पर दो तरह के Paraborg तैयार किए। एक कॉकरोच को कैमरे के जरिए खोज करने के लिए तैयार किया गया, जबकि दूसरे में बेहद छोटा ऑटोमैटिक इंजेक्शन सिस्टम लगाया गया।
कैसे कंट्रोल होता है कॉकरोच?
साइबॉर्ग तैयार करने के लिए कॉकरोच को बेहोश करके उसके शरीर में इलेक्ट्रोड और माइक्रोचिप लगाए गए। इसके बाद इलेक्ट्रिक सिग्नल के जरिए उसके चलने की दिशा और रफ्तार को नियंत्रित किया जा सकता है। कॉकरोच के एंटीना में लगे इलेक्ट्रोड दिशा बदलने में मदद करते हैं, जबकि उसके शरीर के पिछले हिस्से में मौजूद सेंसरी ऑर्गन से जुड़े इलेक्ट्रोड उसकी गति को नियंत्रित करते हैं। रिसर्च में कॉकरोच को रिमोट से कंट्रोल करने के लिए अलग-अलग इलेक्ट्रिक सिग्नल और 10 से 40 हर्ट्ज की फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल किया गया।
जरूरत पड़ने पर देगा दवा
इस साइबॉर्ग की खासियत सिर्फ पीड़ित को खोजना नहीं है। इसमें एक छोटा ऑटोमैटिक इंजेक्शन सिस्टम भी लगाया गया है। यह सिस्टम कैमिकल रिएक्शन, स्प्रिंग और सिरिंज से मिलकर बना है। सिस्टम एक्टिव होने पर स्प्रिंग सिरिंज के प्लंजर को दबाती है, जिससे जरूरत पड़ने पर दवा दी जा सकती है।
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टेस्ट में कैसी रही परफॉर्मेंस?
शोधकर्ताओं ने सिस्टम का टेस्ट भी किया। एक कॉकरोच को रिमोट से कंट्रोल करके तीन चेकपॉइंट्स से गुजरते हुए एक तय जगह तक पहुंचाया गया। इसके बाद इंजेक्शन सिस्टम के जरिए टारगेट पर दवा देने का परीक्षण किया गया। टेस्ट में टारगेट के पास पहुंचने के बाद इंजेक्शन देने की सफलता दर करीब 95 फीसदी रही। हालांकि पूरे सिस्टम की सटीकता करीब 72 फीसदी दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने एक साइबॉर्ग कॉकरोच में कैमरा लगाकर नकली टारगेट खोजने का परीक्षण किया, जबकि दूसरे कॉकरोच का इस्तेमाल इंजेक्शन सिस्टम के लिए किया गया।
भविष्य में रेस्क्यू टीम का हिस्सा बन सकते हैं
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे साइबॉर्ग कीड़ों का इस्तेमाल आपदा के दौरान खोज और बचाव अभियान में किया जा सकता है। इनका छोटा आकार उन्हें मलबे के बेहद संकरे हिस्सों तक पहुंचने में मदद कर सकता है, जहां इंसान या बड़े रोबोट आसानी से नहीं पहुंच पाते। रिसर्च टीम को उम्मीद है कि अगले कुछ वर्षों में ऐसे साइबॉर्ग की एक पूरी टीम तैयार की जा सकेगी, जो प्राकृतिक आपदाओं के दौरान फंसे लोगों को खोजने और शुरुआती मदद पहुंचाने में उपयोगी साबित हो सकती है।




















