सुप्रीम कोर्ट का उलटफेर! एक हफ्ते में तीसरी बार पलटा सजा का फैसला, हत्या के आरोपी को मिली राहत

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हाल के दिनों में तीन आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि को रद्द कर आरोपियों को राहत दी है। इन मामलों में निचली अदालतों के साथ संबंधित हाई कोर्ट भी आरोपियों को दोषी ठहरा चुके थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में सबूतों की दोबारा जांच के दौरान कई अहम कमियां सामने आईं। अदालतों ने खास तौर पर इस बात पर ध्यान दिया कि केवल शक या अधूरी परिस्थितियों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ताजा मामला तेलंगाना में हुए अपहरण और हत्या से जुड़ा है, जिसमें अदालत ने आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं पाए।
तेलंगाना के किडनैप-मर्डर केस में आरोपी को राहत
सुप्रीम कोर्ट के सामने आया सबसे ताजा मामला साल 2012 का है। तेलंगाना में एक व्यक्ति का अपहरण किया गया था। अपहरणकर्ताओं ने उसके परिवार से 23 लाख रुपये की फिरौती मांगी। परिवार ने किसी तरह 1.5 लाख रुपये की रकम जुटाकर देने की कोशिश की लेकिन इसके बावजूद अपहृत व्यक्ति की हत्या कर दी गई। बाद में आरोपियों ने बताया कि मृतक का शव एक फ्लैट के अंदर रखे फ्रिज में छिपाया गया था। इस मामले में कुल छह आरोपियों पर कार्रवाई हुई थी। सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई। ट्रायल कोर्ट ने बाकी पांच लोगों को दोषी माना। इसके बाद तेलंगाना हाई कोर्ट ने चार आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि एक आरोपी की सजा बरकरार रखी।
सिर्फ शव मिलने से अपराध साबित नहीं
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मौत का कारण दम घुटना और गला घोंटना सामने आता है। शव फ्रिज में छिपाकर रखे जाने की बात भी सामने आई थी लेकिन अदालत ने साफ किया कि इन तथ्यों से आरोपी को हत्या से जोड़ने वाला कोई मजबूत सबूत सामने नहीं आता। कोर्ट के मुताबिक अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी का उस अपराध या फ्लैट से सीधा संबंध था। इसी आधार पर दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया गया।
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17 साल जेल में रहने के बाद मिली आजादी
एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कुकर्म और हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहे व्यक्ति को भी बरी कर दिया। इस मामले में आरोपी पर आरोप था कि उसने स्नैक्स का लालच देकर एक बच्चे के साथ अपराध किया। अंबाला की अदालत ने अप्रैल 2010 में उसे दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा दी थी। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2022 में उसकी अपील भी खारिज कर दी थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
DNA जांच नहीं होने से कमजोर हुआ केस
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने मामले में जांच की कमियों को अहम माना। कोर्ट ने कहा कि पुलिस आरोपी के अंडरगारमेंट में मिले सीमेन का DNA टेस्ट नहीं करा सकी। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती थी कि उसका संबंध पीड़ित से था या नहीं। अदालत ने यह भी माना कि आरोपी को बच्चे के साथ आखिरी बार देखे जाने की कहानी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं थी। अभियोजन की कहानी में कई अहम कड़ियां जुड़ नहीं पा रही थीं। आरोपी ने इस मामले में करीब 17 साल जेल में बिताए।
बिहार के पुराने हत्या केस में भी पलटा फैसला
तीसरा मामला बिहार का है, जहां करीब 25 साल पुराने हत्या के मामले में छह लोगों को दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट के बाद पटना हाई कोर्ट ने भी उनकी सजा को बरकरार रखा था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर सबूतों की फिर से जांच की गई। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं। अदालत ने चश्मदीदों के बयानों पर भी भरोसा करने से इनकार किया। कोर्ट ने जांच की स्थिति पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह केवल खराब जांच का मामला नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है कि मामले में सही तरीके से जांच ही नहीं की गई।
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सबूतों की कमी बनी बरी होने की वजह
तीनों मामलों में आरोप अलग-अलग थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में एक बात समान रही। अदालत ने माना कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए केवल शक, अधूरी कहानी या कमजोर परिस्थितिजन्य सबूत पर्याप्त नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में अभियोजन की कहानी और उपलब्ध सबूतों के बीच की दूरी को देखा। जहां आरोप साबित करने के लिए जरूरी कड़ियां नहीं मिलीं, वहां अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखने के बजाय आरोपियों को बरी कर दिया।



















