छात्र प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा दखल,FIR पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक; केंद्र और 7 राज्यों से मांगा जवाब

नई दिल्ली। NEET पेपर लीक को लेकर देशभर में हुए छात्र प्रदर्शनों और उन पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रदर्शनकारियों को अंतरिम राहत दी है। अदालत ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR में फिलहाल किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही केंद्र सरकार और सात राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पूरे मामले में ऐसे कई आरोप सामने आए हैं जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
नाबालिग प्रदर्शनकारियों को राहत देने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जिन प्रदर्शनकारियों की उम्र 18 वर्ष से कम है और जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। अदालत ने माना कि नाबालिगों के साथ कानून के अनुसार संवेदनशील व्यवहार किया जाना चाहिए और बिना पर्याप्त आधार के उन्हें हिरासत में रखना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जिन राज्यों में प्रदर्शन हुए हैं, वहां मौजूद सभी डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए ताकि भविष्य की जांच में किसी तरह की बाधा न आए।
CCTV, ड्रोन और बॉडी कैमरा फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश
पीठ ने सभी संबंधित राज्यों को निर्देश दिया कि प्रदर्शन से जुड़े CCTV फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा फुटेज, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड और PCR लॉग को सुरक्षित रखा जाए। अदालत ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों से जुड़ा यदि कोई डिजिटल डेटा या अन्य जानकारी एकत्र की गई है तो उसे सुरक्षित रखा जाए, लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया जाए। कोर्ट ने माना कि डिजिटल साक्ष्य किसी भी स्वतंत्र जांच का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं और इन्हें नष्ट होने से बचाना जरूरी है।
पैलेट गन और इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल पर उठे गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि विभिन्न याचिकाओं में कई समान आरोप सामने आए हैं। इनमें एक 19 वर्षीय युवक की आंख की रोशनी पैलेट गन के इस्तेमाल से जाने का मामला भी शामिल है। अदालत के सामने इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल, गंभीर रूप से घायल एक युवती के ICU में भर्ती होने, वकीलों पर हमले और एक मीडिया कर्मी के साथ कथित मारपीट के आरोप भी रखे गए। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह गंभीर चिंता का विषय है और इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
'यह शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शन था'
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार यह एक शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शन था, जिसमें संविधान के दायरे में रहते हुए कुछ मांगें उठाई जा रही थीं। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार ऐसे प्रदर्शनों में कुछ ऐसे लोग शामिल हो जाते हैं जिनका अपना अलग एजेंडा होता है और बाद में वही माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। हालांकि अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पुलिसकर्मियों के परिवारों की ओर से भी याचिकाएं दाखिल की गई हैं, जिनमें पुलिस पर हमले के आरोप लगाए गए हैं। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
याचिकाकर्ताओं ने पुलिस कार्रवाई पर उठाए कई सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि यह केवल दिल्ली तक सीमित मामला नहीं है बल्कि देशभर में हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने अदालत के सामने एक वीडियो का हवाला देते हुए दावा किया कि उसमें एक सहायक उप निरीक्षक (ASI) खुद एक कार के शीशे तोड़ता दिखाई दे रहा है। उनका कहना था कि यदि जिम्मेदारी केवल निचले स्तर तक सीमित रही तो जवाबदेही तय नहीं हो पाएगी। वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने अदालत को बताया कि कई पुलिसकर्मी बिना नाम की पट्टी के ड्यूटी पर मौजूद थे, जिससे उनकी पहचान करना मुश्किल हो गया।
बिहार की घटनाओं को लेकर भी अदालत में उठे सवाल
बिहार से जुड़े मामलों का उल्लेख करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा कि वहां हालात दिल्ली से भी अधिक गंभीर रहे। उन्होंने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने कुछ FIR वापस लेने का दावा किया है, लेकिन इसके बावजूद 140 से अधिक लोग अब भी हिरासत में हैं। इनमें बड़ी संख्या 16 से 18 वर्ष के किशोरों की है, जबकि एक 13 वर्षीय बच्चे का भी मामला सामने आया। उनका आरोप था कि इन नाबालिगों को 40 घंटे से अधिक समय बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
प्रशांत भूषण और श्याम दीवान ने भी रखे अपने तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि जुनैद मलिक नाम का एक युवक केवल प्रदर्शनकारियों को भोजन पहुंचाने गया था, लेकिन उसे हिरासत में लेकर आंखों पर पट्टी बांधकर मसूरी हाईवे पर छोड़ दिया गया। उन्होंने दावा किया कि उसके परिवार से भी पूछताछ की गई। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत के सामने यह मुद्दा उठाया कि जंतर-मंतर क्षेत्र में सुबह चार बजे पत्थरों से भरा ट्रक कैसे पहुंचा। उन्होंने कहा कि यदि ट्रक दिल्ली पुलिस की कई सुरक्षा परतों को पार करके अंदर पहुंच गया तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने भी अदालत से कहा कि यदि पुलिस को ही यह जानकारी नहीं है कि ट्रक वहां कैसे पहुंचा, तो यह पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
फेशियल रिकग्निशन डेटा के इस्तेमाल पर भी चिंता
श्याम दीवान ने अदालत के सामने यह मुद्दा भी रखा कि प्रदर्शन के दौरान यदि चेहरा पहचानने वाली तकनीक (Facial Recognition) का इस्तेमाल किया गया है तो उससे जुटाए गए डेटा का उपयोग प्रदर्शनकारियों की प्रोफाइलिंग के लिए नहीं होना चाहिए। इस पर अदालत ने भी कहा कि प्रदर्शनकारियों से जुड़ा कोई भी डेटा सार्वजनिक नहीं किया जाएगा और उसे केवल सुरक्षित रखा जाएगा ताकि जांच प्रभावित न हो।
सुरक्षा उपकरणों पर भी अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पुलिसकर्मियों के सुरक्षा उपकरणों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भीड़ नियंत्रण के दौरान आक्रामक हथियारों की तुलना में सुरक्षात्मक उपकरण अधिक महत्वपूर्ण हैं। अदालत ने संकेत दिया कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए पुलिस व्यवस्था की भी समीक्षा की जानी चाहिए।
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स्वतंत्र जांच के संकेत, अगली सुनवाई पर सबकी नजर
सुनवाई के अंत में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों और आरोपों को देखते हुए सबसे संयमित शब्दों में भी यह कहा जा सकता है कि मामले की स्वतंत्र जांच आवश्यक दिखाई देती है। अदालत ने संकेत दिया कि पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति या विशेष जांच दल (SIT) गठित किया जा सकता है। फिलहाल केंद्र सरकार और सात राज्यों से जवाब तलब किया गया है और मामले की अगली सुनवाई में आगे की कार्रवाई तय होगी।












