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PU Special:झीरम घाटी के 185 पन्नों के फैसले में खुली हमले की परतें, 206 गोलियां, 8-9 फीट का गड्ढा और माओवादी साजिश के साक्ष्य

10 माओवादियों को मृत्युदंड के बाद फैसले में सामने आए कई अहम तथ्य, कोर्ट ने फॉरेंसिक, बैलिस्टिक, पोस्टमार्टम और गवाहियों को कैसे परखा,206 गोलियों की गूंज, विस्फोट से बना गड्ढा और गवाहियों की कड़ियां 185 पन्नों में झीरम हमले की जांच के अहम पहलू दर्ज।NIA के अनुसार हमले में 27 लोगों की मौत और 38 घायल हुए थे। 10 आरोपी माओवादी कैडरों को मृत्युदंड दिया गया है।
झीरम घाटी के 185 पन्नों के फैसले में खुली हमले की परतें, 206 गोलियां, 8-9 फीट का गड्ढा और माओवादी साजिश के साक्ष्य

प्रेम कुमार,रायपुर: झीरम घाटी हमले के मामले में NIA की विशेष अदालत के करीब 185 पन्नों के फैसले ने 25 मई 2013 की उस भयावह वारदात से जुड़े कई अहम कानूनी और साक्ष्यात्मक पहलुओं को सामने रखा है। फैसले में घटनास्थल के फॉरेंसिक साक्ष्य, बैलिस्टिक रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, गवाहियों और माओवादी गतिविधियों से जुड़े तथ्यों की विस्तार से समीक्षा की गई। NIA के अनुसार हमले में 27 लोगों की मौत और 38 लोग घायल हुए थे। अदालत ने आरोपितों को माओवादी संगठन और हमले से जोड़ने वाले साक्ष्यों की विश्वसनीयता को भी परखा।

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185 पन्नों के फैसले में क्या-क्या सामने आया?

झीरम घाटी हमले का फैसला सिर्फ वारदात की घटनाओं तक सीमित नहीं रहा। अदालत ने अभियोजन की ओर से पेश किए गए वैज्ञानिक साक्ष्यों, प्रत्यक्ष एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्यों तथा गवाहियों को एक साथ रखकर उनकी विश्वसनीयता पर विचार किया। फैसले में यह भी देखा गया कि आरोपितों को प्रतिबंधित माओवादी संगठन तथा 25 मई 2013 के हमले से जोड़ने वाले साक्ष्य कितने मजबूत और विश्वसनीय हैं।

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206 गोलियां चलीं, विस्फोट से बना 8-9 फीट का गड्ढा

फैसले में दर्ज फॉरेंसिक साक्ष्यों के मुताबिक घटनास्थल लगभग 10,61,874 वर्गफुट क्षेत्र में फैला हुआ था। सड़क के बीच करीब 8 से 9 फीट का गड्ढा बनाने के लिए विस्फोट किए जाने का उल्लेख है। मौके से 5.56 एमएम, 7.62 एमएम और एसएलआर सहित विभिन्न हथियारों के इस्तेमाल से जुड़े साक्ष्य मिले। बैलिस्टिक जांच के आधार पर करीब 206 गोलियां चलना प्रमाणित माना गया।

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी अहम कड़ी जोड़ी

मेडिकल और पोस्टमार्टम साक्ष्यों को भी फैसले में महत्वपूर्ण माना गया। उपलब्ध साक्ष्यों से 27 मौतों की प्रकृति हत्यात्मक होना स्थापित हुआ। यानी अदालत के सामने घटनास्थल के वैज्ञानिक साक्ष्य, हथियारों से जुड़े बैलिस्टिक तथ्य और पोस्टमार्टम रिपोर्ट—तीनों को मामले की समग्र जांच में देखा गया।

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10 माओवादियों को मृत्युदंड, 27 मोस्ट वांटेड का भी जिक्र

NIA की 16 सितंबर 2026 की जानकारी के अनुसार विशेष अदालत ने झीरम घाटी हमले के मामले में 10 आरोपी माओवादी कैडरों को मृत्युदंड सुनाया है। फैसले में 27 मोस्ट वांटेड माओवादियों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्हें मामले में फरार बताया गया है। इनमें देवजी, देवा, सुरेंद्र, गणेश और अरुणाराव सहित अन्य नाम शामिल हैं। रिकॉर्ड में कुछ आरोपितों के आत्मसमर्पण करने या मुठभेड़ में मारे जाने का भी उल्लेख है।

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हमले से पहले 11 दिन तक गतिविधियों का दावा

कुछ गवाहियों में हमले से पहले माओवादी गतिविधियों, गांवों में बैठकों और प्रशिक्षण का उल्लेख सामने आया है। गवाहों के अनुसार हमले से पहले करीब 11 दिन तक प्रशिक्षण और बैठकों की गतिविधियां चलने की बात कही गई। एकnअभियोजन गवाह ने वर्ष 2009 में माओवादियों के साथ काम करने और करीब सात-आठ दिन प्रशिक्षण लेने की बात बताई।

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गांव में बैठक, हथियार जुटाने पर चर्चा का उल्लेख

एक अन्य गवाही में वर्ष 2013 में गांव में माओवादी सदस्यों की बैठक होने का उल्लेख है। इस बैठक में देवा, विनोद, महादेव, मुन्ना, जोगा और कोसा समेत कई नाम सामने आने की बात कही गई। गवाही के अनुसार बैठक में पुलिस पर हमले तथा हथियार और अन्य सामान जुटाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। कुछ गवाहियों में माओवादी सदस्यों के गांव पहुंचने, ग्रामीणों को बुलाने और भोजन उपलब्ध कराने का भी उल्लेख है।

TIP नहीं हुई तो क्या पहचान खत्म हो जाती है?

बचाव पक्ष ने आरोपितों की पहचान को लेकर सवाल उठाया। दलील दी गई कि जांच के दौरान Test Identification Parade (TIP) नहीं कराई गई और अदालत में पहली बार हुई पहचान पर भी आपत्ति जताई गई। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए कहा गया कि अदालत में आरोपित की पहचान मूल साक्ष्य हो सकती है। TIP जांच का हिस्सा है और अदालत में पहचान की पुष्टि के लिए कराई जाती है। इसलिए केवल TIP नहीं होने के आधार पर अदालत में की गई पहचान स्वतः अस्वीकार्य नहीं होती। उसकी विश्वसनीयता को अन्य प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के साथ परखा जाना जरूरी है।

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गवाहों के बयान में देरी पर कोर्ट ने क्या कहा?

बचाव पक्ष ने कुछ गवाहों के धारा 161 के तहत बयान देर से दर्ज होने को भी आधार बनाया। अदालत ने माना कि केवल बयान दर्ज होने में देरी से गवाही अपने आप अविश्वसनीय नहीं हो जाती। देरी के कारण, मामले की परिस्थितियां और दूसरे उपलब्ध साक्ष्यों के साथ गवाही की संगति को भी देखना जरूरी है।

गवाही में कवासी लखमा का भी उल्लेख

फैसले में अभियोजन साक्षी क्रमांक 23 की गवाही का भी उल्लेख है। गवाह के अनुसार परिवर्तन यात्रा के दौरान कवासी लखमा 

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नंदकुमार पटेल के वाहन में बैठे थे।

गवाही के मुताबिक रास्ते में उन्हें कई फोन आए और गवाह ने उनके गोंडी भाषा में बातचीत करने की बात कही। इसमें करीब 10-15 कॉल का उल्लेख किया गया है। गवाह के अनुसार नंदकुमार पटेल ने उन्हें हिंदी में बात करने के लिए भी कहा था।

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अहम बात

यह हिस्सा अभियोजन साक्षी का कथन है, अदालत का निष्कर्ष नहीं। इसलिए इसे किसी व्यक्ति की भूमिका पर अदालत की ओर से स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। आगे की न्यायिक प्रक्रिया में रिकॉर्ड में मौजूद इस गवाही का कानूनी महत्व भी जांच का विषय हो सकता है।

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पहले नौ आरोपितों पर 2014 में चार्जशीट

NIA के रिकॉर्ड के अनुसार पहले नौ गिरफ्तार आरोपितों के खिलाफ वर्ष 2014 में आरोपपत्र दाखिल किया गया था।इसके बाद वर्ष 2015 में 30 आरोपितों के खिलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किया गया। फरार आरोपितों के संबंध में जांच जारी रखी गई थी।

सरेंडर कर चुके आरोपितों की कानूनी स्थिति अहम

झीरम मामले में लंबे समय तक वांछित रहे कुछ आरोपितों के बाद में आत्मसमर्पण करने का भी उल्लेख सामने आता है। ऐसे आरोपितों के खिलाफ मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई किस तरह आगे बढ़ेगी, यह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है। विशेष अदालत के फैसले के बाद अब प्रत्येक आरोपित की स्थिति, उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य और संबंधित कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

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अब हाईकोर्ट में क्या होगा?

विशेष अदालत के फैसले के बाद मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी। मृत्युदंड के मामलों में हाईकोर्ट की पुष्टि की प्रक्रिया कानून का हिस्सा है। बचाव पक्ष की ओर से पहचान, गवाहियों में देरी और साक्ष्यों की स्वीकार्यता जैसे मुद्दे उठाए जा सकते हैं। वहीं अभियोजन पक्ष वैज्ञानिक साक्ष्य, घटनास्थल, मेडिकल रिपोर्ट और गवाहियों के समग्र प्रभाव पर अपना पक्ष रख सकता है। आगे मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की स्थिति में इन कानूनी और साक्ष्यात्मक पहलुओं की दोबारा न्यायिक समीक्षा संभव है।

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झीरम केस में अब सबसे बड़ा सवाल क्या?

185 पन्नों के फैसले ने झीरम घाटी हमले से जुड़े फॉरेंसिक साक्ष्य, 206 गोलियों, विस्फोट, माओवादी गतिविधियों, गवाहियों, पहचान और आरोपितों की कानूनी स्थिति जैसे कई पहलुओं को सामने रखा है। हालांकि फैसले में दर्ज हर गवाही को अदालत का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। विशेष रूप से किसी व्यक्ति का नाम गवाह के बयान में आने और अदालत द्वारा उस व्यक्ति की भूमिका स्थापित किए जाने में अंतर है। अब आगे की न्यायिक प्रक्रिया में यही देखा जाना महत्वपूर्ण होगा कि निचली अदालत के निष्कर्षों और उपलब्ध साक्ष्यों पर उच्च न्यायालय तथा आवश्यकता पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट किस तरह विचार करता है।

PREM

मै प्रेम निर्मलकर मैने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से की, विगत 18 वर्षों से मुझे पत...

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