Download App
Download on the App StoreGet it on Google Play
Breaking News

चेरनोबिल परमाणु आपदा के बाद, वैज्ञानिकों ने दूषित पानी और मिट्टी से रेडियोएक्टिव पदार्थ निकालने के लिए सूरजमुखी के पौधे लगाए, इन्होंने रेडियोएक्टिव आइसोटोप सोख लिया

चेर्नोबिल के बाद सूरजमुखी ने कैसे साफ किया रेडिएशन? फाइटोरेमेडिएशन की कहानी, वैज्ञानिकों ने 1986 की परमाणु आपदा के बाद खोजा था अनोखा तरीका, फुकुशिमा में भी आजमाया गया प्रयोग
चेरनोबिल परमाणु आपदा के बाद, वैज्ञानिकों ने दूषित पानी और मिट्टी से रेडियोएक्टिव पदार्थ निकालने के लिए सूरजमुखी के पौधे लगाए, इन्होंने रेडियोएक्टिव आइसोटोप सोख लिया

मॉस्को। चेर्नोबिल परमाणु आपदा (1986) के बाद वैज्ञानिकों ने रेडियोधर्मी प्रदूषण को साफ करने के लिए एक अनोखा तरीका खोजा था। इस तरीके में पौधों के जरिए पर्यावरण से रेडियोन्यूक्लाइड्स को सोखा जाता है। इस प्रयोग में सूरजमुखी (Sunflower) एक असरदार विकल्प के रूप में सामने आया। सूरजमुखी की जड़ें दूषित पानी से सीजियम और स्ट्रोंटियम जैसे कुछ रेडियोधर्मी तत्वों को अवशोषित कर सकती हैं। चेर्नोबिल के पास किए गए प्रयोगों में पता चला कि सूरजमुखी एक छोटे दूषित तालाब से रेडियोन्यूक्लाइड्स की बड़ी मात्रा को हटा सकते हैं।

फुकुशिमा के बाद भी जांचा था

बाद में 2011 की फुकुशिमा दाइची परमाणु दुर्घटना के बाद भी इस पद्धति की जांच की गई। शोधकर्ताओं ने पाया कि फूल रेडियोधर्मी पदार्थ को अवशोषित कर सकते हैं। हालांकि इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि रेडियोएक्टिव गंदगी पानी में है या मिट्टी में।

सनफ्लॉवर रेडियोएक्टिव पदार्थ को ऐसे अवशोषित करते हैं

इस प्रक्रिया को फाइटोरेमेडिएशन (Phytoremediation) कहा जाता है, जिसमें पौधों का उपयोग प्रदूषकों को हटाने या नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। राइजोफिल्ट्रेशन (Rhizofiltration) नामक एक तकनीक पानी से प्रदूषकों को पकड़ने के लिए पौधों की जड़ों का उपयोग करती है।  सूरजमुखी ने वैज्ञानिकों का ध्यान इसलिए खींचा क्योंकि ये तेजी से बढ़ते हैं, ज्यादा बायोमास पैदा करते हैं और अपनी सामान्य पोषक तत्व-ग्रहण प्रक्रिया के जरिए तत्वों को सोख लेते हैं। दरअसल, रेडियोधर्मी सीजियम-137 की रासायनिक विशेषताएं पोटेशियम से मिलती-जुलती हैं, जो पौधों के लिए एक जरूरी पोषक तत्व है। वहीं, स्ट्रोंटियम-90 कुछ मायनों में कैल्शियम की तरह व्यवहार करता है, इसलिए सूरजमुखी इसे भी आसानी से अवशोषित कर लेता है।

समानता के कारण सोख लेते हैं पौधे

इन रासायनिक समानताओं की वजह से पौधे अपने पोषक तत्व वाले रास्तों से ही इन तत्वों के रेडियोएक्टिव रूप को भी सोख लेते हैं। यही कारण है कि सूरजमुखी के पौधे दूषित पानी और मिट्टी से जुड़े प्रयोगों के लिए उपयोगी साबित होते हैं।

चेर्नोबिल के दूषित तालाब में हुआ मशहूर प्रयोग सबसे चर्चित

यह प्रयोग चेर्नोबिल क्षेत्र के एक छोटे दूषित तालाब में किया गया था। शोधकर्ताओं ने सूरजमुखी को सीधे मिट्टी में लगाने के बजाय पानी में तैरते हुए राफ्ट पर उगाया, ताकि उनकी जड़ें सीधे दूषित पानी तक पहुंच सकें। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (US EPA) की एक टेक्नोलॉजी असेसमेंट रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रयोग में लगे सूरजमुखी के पौधों ने सिर्फ 10 दिनों के अंदर तालाब से लगभग 95% रेडियोन्यूक्लाइड्स को सोख लिया था। इस प्रयोग में राइजोफिल्ट्रेशन तकनीक का इस्तेमाल किया गया था, जिसमें मुख्य रूप से रेडियोएक्टिव सीजियम और स्ट्रोंटियम पर फोकस किया गया। नतीजों से साफ हुआ कि जब रेडियोधर्मी पदार्थ पानी में घुले होते हैं, तो पौधे बड़ी मात्रा में रेडिएशन को अवशोषित करने में सक्षम होते हैं।

सीजियम और स्ट्रोंटियम पौधों में क्यों पहुंच जाते हैं

पौधों द्वारा रेडियोधर्मी तत्वों को सोखने का सीधा संबंध उनकी रासायनिक संरचना से है। सीजियम-137, पोटेशियम जैसा होता है, जो पौधों के विकास के लिए बेहद जरूरी है। इसी वजह से रेडियोधर्मी सीजियम भी उन्हीं रास्तों से पौधे में प्रवेश कर जाता है, जिनसे पोटेशियम अवशोषित होता है। वहीं, स्ट्रोंटियम-90 रासायनिक रूप से कैल्शियम के समान होता है। इसलिए पौधे इसे कैल्शियम लेने की प्रक्रिया के दौरान ही अवशोषित कर लेते हैं।एक बार पौधे के अंदर पहुंचने के बाद ये रेडियोन्यूक्लाइड जड़ों, तनों और पत्तियों समेत अलग-अलग हिस्सों में जमा हो सकते हैं। कितनी मात्रा जमा होगी और कहां जमा होगी, यह आइसोटोप के प्रकार, पौधे की प्रजाति और उसकी बढ़ने की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह प्रक्रिया रेडियोधर्मी पदार्थ को खत्म नहीं करती, बल्कि उसे पानी या मिट्टी से हटाकर पौधे के अंदर स्थानांतरित कर देती है।

Puneet Pandey
By Puneet Pandey

Latest Posts