Garima Vishwakarma
19 Jan 2026
पल्लवी वाघेला,भोपाल। मैडम, बेटी विदेश और बेटा इंडिया में है। दोनों बच्चों की अपनी व्यस्तताएं हैं। उनके पास इतना समय भी नहीं कि वो अस्पताल में आकर भी हमारा हालचाल पूछ सकें। परिचित भी व्यस्त रहते हैं। ऐसे में लगता है कि हमारी अंतिम क्रियाएं ढंग से हो पाएंगी या नहीं। क्या कोई ऐसी योजना या कोई संस्था है, जो हमारी अंतिम क्रिया की पूरी जिम्मेदारी ले सके। इंदौर के दुबे परिवार के मुखिया ने एल्डर हेल्पलाइन 14567 पर यह सवाल पूछा। बच्चों से दूर अकेलेपन का अहसास झेल रहे प्रदेश के बुजुर्ग अपनी अंतिम क्रियाविधि को लेकर आशंकित हैं। उन्हें लगता है कि बच्चे और परिचित-पड़ोसी सभी इतने व्यस्त हैं कि जैसे उन्होंने अपने पुरखों की अंतिम क्रिया की है, वैसी शायद उन्हें नसीब न हो। अकेले एल्डर हेल्पलाइन पर मई से लेकर अक्टूबर तक ऐसी 23 कॉल पहुंची हैं, जिनमें बुजुर्गों ने यह आशंका जताई।
बड़े शहरों के साथ ही छोटे शहर-गांव के बुजुर्ग भी चिंतित हैं। शहरी वृद्धजन को डर है कि जिस तेजी से 13 दिन की क्रिया 3 दिन में सिमट रही है, ऐसा उनके साथ न हो, इसलिए वह पैसा देने को तैयार हैं, लेकिन चाहते हैं कि पूरे विधि-विधान से दुनिया से रुखसत हों। सागर जिले के एक बुजुर्ग ने एल्डर हेल्पलाइन पर पूछा कि क्या सरकार अंतिम संस्कार के लिए आर्थिक सहायता देती है। वे चाहते थे कि उनके दाह संस्कार से 13वीं तक की क्रियाएं पूरे सम्मान से हों। काउंसलिंग के बाद परिवार के सहयोग से बुजुर्ग को भावनात्मक संबल मिला। भोपाल में फ्लैट में अकेले रह रहे बुजुर्ग ने बेटी की मौत के बाद परिवार से दूरी और असहायता की बात हेल्पलाइन पर साझा की। उन्होंने दाह संस्कार की व्यवस्था के लिए ऑनलाइन स्टार्टअप से भी संपर्क किया था, पर सेवा उपलब्ध नहीं थी। काउंसलिंग के जरिए उन्हें भरोसा दिलाया गया कि वे अकेले नहीं हैं। काउंसलर दिव्या दुबे का कहना है कि शहरी व्यस्त जीवन में बुजुर्ग खुद को अकेला महसूस करते हैं। ऐसे में उनका आत्मविश्वास बढ़ाने और परिवार की काउंसलिंग बेहद जरूरी है। संवाद और भावनात्मक सहयोग से लगभग 85 फीसदी इमोशनल सपोर्ट वाले मामले केवल बातचीत से ही सुलझाए जा चुके हैं।