PU Special :राजनांदगांव: मिट्टी के रावण का सिर काटकर निभाई जाती है परंपरा..छुईखदान में 300 साल से तलवार से होता है दशानन वध

संजय सिंह राजपूत,राजनांदगांव। देशभर में विजयादशमी पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक नगरी छुईखदान में दशहरे की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है। यहां रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि मिट्टी से बने विशालकाय रावण का तलवार से सिर काटकर वध किया जाता है। करीब 250 से 300 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में आज भी राजपरिवार की भूमिका सबसे अहम है। शाही सवारी, वैष्णव संप्रदाय के धार्मिक प्रतीक, मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन के बीच होने वाला यह आयोजन छुईखदान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन चुका है।
रावणभाठा में निभाई जाती है सदियों पुरानी परंपरा
छुईखदान रियासत में विजयादशमी के दिन मिट्टी के रावण का वध करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। रियासत के प्रथम महंत रूपदास से लेकर विभिन्न शासकों ने इस परिपाटी को आगे बढ़ाया। महंत तुलसीदास, बालमुकुंद, लक्ष्मणदास, श्याम किशोरदास, राधावल्लभ किशोरदास, दिग्विजय युगल किशोरदास और भुधर किशोरदास सहित राजपरिवार के पूर्वजों के समय से इस परंपरा के निर्वहन का उल्लेख मिलता है। अंतिम राजा ऋतु किशोरदास के समय भी विजयादशमी पर रावणभाठा में मिट्टी के रावण का वध किया जाता रहा। राजपरिवार के उत्तराधिकारियों ने इस धार्मिक परंपरा को टूटने नहीं दिया। पूर्ववर्ती उत्तराधिकारियों के बाद अब राजा गिरिराज किशोरदास इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। बदलते समय के बावजूद आयोजन की मूल धार्मिक प्रक्रिया आज भी कायम है।
शाही सवारी के साथ रावणभाठा पहुंचता है राजपरिवार
विजयादशमी पर राजपरिवार की शाही सवारी के साथ रावण वध की यात्रा निकाली जाती है। राजा गिरिराज किशोरदास अपने अनुज देवराज किशोरदास और पुरोहित के साथ इसमें शामिल होते हैं। आगे ब्राह्मण निशान धारण कर चलते हैं, जबकि भजन मंडली भजन-कीर्तन करते हुए वातावरण को भक्तिमय बनाती है। यह काफिला परंपरागत रूप से रावणभाठा पहुंचता है, जहां मिट्टी से निर्मित विशालकाय रावण का वध किया जाता है। रावणभाठा पहुंचने के बाद मंत्रोच्चार के साथ भगवान श्रीराम की पूजा-अर्चना होती है। इसके पश्चात राजा भगवान श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में मिट्टी के रावण का तलवार से शिरोच्छेदन करते हैं। यही इस आयोजन की सबसे विशिष्ट रस्म है, जो छुईखदान को दशहरा मनाने की अपनी अलग परंपरा के कारण विशिष्ट पहचान देती है।
रावण की मिट्टी को मानते हैं अमृत, घर ले जाकर करते हैं पूजा
इस परंपरा का एक और अनूठा पक्ष रावण वध के बाद सामने आता है। मान्यता के अनुसार, रावण की नाभि में अमृत कुंड होने के कारण भगवान श्रीराम ने उसका वध किया था। इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी परंपरा में राजा तलवार की नोक से रावण की मिट्टी निकालकर उसे अमृत के प्रतीक के रूप में सुरक्षित रखते हैं। इसके बाद नगरवासी भी रावण की मिट्टी के छोटे-छोटे टुकड़े अपने घर ले जाते हैं। घर पहुंचने पर महिलाएं इस मिट्टी की पूजा-अर्चना करती हैं और पान खिलाने की परंपरा निभाई जाती है। फिर मिट्टी को लक्ष्मी के स्थान पर रखा जाता है। स्थानीय मान्यता में यह रस्म शुभता, समृद्धि और पारंपरिक आस्था से जुड़ी हुई है।
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हनुमान के निशान और वैष्णव परंपरा का भी विशेष महत्व
छुईखदान की इस ऐतिहासिक परंपरा में धार्मिक प्रतीकों का भी विशेष स्थान है। यहां हनुमानजी के निशान को वैष्णव संप्रदाय के निंबार्क मत से जुड़ा प्रतीक माना जाता है। परंपरा में इसे धनुष-बाण का प्रतीक मानकर रावण वध की धार्मिक प्रक्रिया से जोड़ा जाता है। पूजा, निशान, शाही सवारी और शिरोच्छेदन की पूरी प्रक्रिया इस आयोजन को सामान्य रावण दहन से अलग बनाती है।
पूर्वजों ने जो नियम-परंपराएं बनाईं आज भी करते हैं पालन
राज परिवार के सदस्य गिरिराज किशोर वैष्णव का कहना है कि पीढ़ियों से आ रही परंपरा का निर्वहन किया जाता है। पूर्वजों ने दशहरा उत्सव के लिए जो नियम और परंपरा निर्धारित की थी राज परिवार आज भी इसका विधिवत पालन कर रहा है। वहीं समिति पदाधिकारी संजीव दुबे ने कहा कि विजयादशमी पर राजपरिवार की शाही सवारी के साथ रावण वध की यात्रा निकाली जाती है। राजा गिरिराज किशोरदास अपने अनुज देवराज किशोरदास और पुरोहित के साथ इसमें शामिल होते हैं।
आस्था और लोक संस्कृतिक का संगम
स्थानीय नागरिक सज्जाद खान कहते हैं कि छुईखदान आज भी अपनी विशिष्ट परंपरा के जरिए इतिहास, आस्था और लोक संस्कृति का संगम प्रस्तुत कर रहा है। मिट्टी के रावण का शिरोच्छेदन और उसकी मिट्टी को घर ले जाकर पूजा करने की परंपरा इस ऐतिहासिक नगरी को प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत में अलग स्थान दिलाती है।
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