PU Special :इंदौर के बेटमा में दशहरे पर 300 वर्षों से घुड़दौड़ और मटकी फोड़, निशानेबाजी की परंपरा; शौर्य, रोमांच और आस्था का अनूठा संगम

राहुल देवड़ा, बेटमा (इंदौर)। देशभर में दशहरा पर्व रावण दहन और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इंदौर जिले का बेटमा नगर अपनी विशिष्ट परंपराओं के लिए अलग पहचान रखता है। यहां दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि करीब 300 वर्षों से चली आ रही वीरता, शौर्य और लोकपरंपरा की जीवंत विरासत है। मां अमन-चमन की पहाड़ी पर होने वाली रोमांचक घुड़दौड़ और मटकी फोड़ निशानेबाजी इस उत्सव का प्रमुख आकर्षण हैं। घोड़ों की टापों और बंदूकों की गूंज के बीच मनाया जाने वाला बेटमा का दशहरा अपनी इसी अनूठी पहचान के चलते देश-प्रदेश में प्रसिद्ध है। विजयादशमी नजदीक आते ही नगर में उत्सव को लेकर उत्साह बढ़ने लगा है और आयोजन की तैयारियां भी गति पकड़ रही हैं।
घुड़दौड़ व निशानेबाजी ऐतिहासिक विरासत की यादें
दशहरा उत्सव समिति के अध्यक्ष धर्मवीर सिंह चौहान (बब्बी दरबार) ने बताया कि बेटमा में दशहरा मनाने की परंपरा लगभग 300 वर्षों से चली आ रही है। इसकी शुरुआत बड़े रावले से हुई थी। उन्होंने बताया कि बचपन से ही वे इस परंपरा को देखते आ रहे हैं। पहले घोड़े और बंदूकें बेटमा की शान माने जाते थे और आज भी घुड़दौड़ व निशानेबाजी के आयोजन उस ऐतिहासिक विरासत और पुरखों के साहस की याद दिलाते हैं। नगरवासी आज भी पूरे उत्साह, उमंग और भाईचारे के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
बड़े रावले से शुरू हुई परंपरा, तीन शताब्दियों से कायम है पहचान
बेटमा में दशहरा उत्सव की परंपरा लगभग 300 वर्ष पुरानी बताई जाती है। इसकी शुरुआत नगर के बड़े रावले से हुई थी। समय के साथ घुड़दौड़ और निशानेबाजी इस आयोजन की पहचान बन गईं। पहले जहां इन स्पर्धाओं में वीरता, साहस और घुड़सवारी के कौशल का प्रदर्शन किया जाता था, वहीं आज ये आयोजन ऐतिहासिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के रूप में लोगों को आकर्षित करते हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती आ रही इस परंपरा से नगरवासियों का गहरा जुड़ाव है। यही वजह है कि आधुनिक दौर में भी बेटमा का दशहरा अपने पारंपरिक स्वरूप और उत्साह के लिए जाना जाता है।

मां अमन-चमन की पहाड़ी पर दिखेगा शौर्य और रोमांच
विजयादशमी पर मां अमन-चमन की पहाड़ी पर होने वाली मटकी फोड़ निशानेबाजी और घुड़दौड़ देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। निशानेबाजी प्रतियोगिता में पहाड़ी से लगभग 100 मीटर दूर रखी मटकी को निशानेबाज अपनी बंदूकों से निशाना लगाकर फोड़ने का प्रयास करते हैं। यह प्रतियोगिता तीन चरणों में आयोजित होती है। सटीक निशाना लगाने का कौशल और प्रतियोगियों के बीच मुकाबला दर्शकों के रोमांच को बढ़ा देता है। वहीं, घुड़दौड़ के दौरान तेज रफ्तार से दौड़ते घोड़ों की टापें और उन्हें नियंत्रित करते घुड़सवार आयोजन में अलग ही उत्साह भर देते हैं। दोनों प्रतियोगिताएं बेटमा के दशहरे को अन्य स्थानों पर होने वाले आयोजनों से अलग पहचान देती हैं।
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इस बार करीब 30 निशानेबाज ले सकते हैं भाग
इस वर्ष मटकी फोड़ निशानेबाजी प्रतियोगिता में करीब 30 निशानेबाजों के भाग लेने की संभावना है। प्रतियोगिता में शामिल होने के इच्छुक निशानेबाजों अपनी बंदूक और लाइसेंस के साथ अनुमति के लिए बेटमा थाने में आवेदन करेंगे। पुलिस अधिकारी आवेदनों के साथ बंदूकों और लाइसेंस की जांच करेंगे। आवश्यक जांच एवं स्वीकृति के बाद ही प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति दी जाएगी। आयोजन की सुरक्षा और नियमों के पालन को लेकर प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी।
हजारों दर्शकों की मौजूदगी से मेले जैसा माहौल
दशहरे के दिन बेटमा में आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों सहित दूर-दराज से भी लोग पहुंचते हैं। मां अमन-चमन की पहाड़ी पर होने वाली प्रतियोगिताओं को देखने के लिए हजारों दर्शकों की भीड़ जुटती है। परिवारों और युवाओं के साथ पहुंचने वाले लोग इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा बनते हैं। घुड़दौड़ और निशानेबाजी के बाद शाम ढलते ही उत्सव का रंग और गहरा हो जाता है। आतिशबाजी से आसमान जगमगा उठता है और इसके बाद 51 फीट ऊंचे रावण का दहन किया जाता है। इस तरह बेटमा में विजयादशमी का उत्सव दिनभर की रोमांचक प्रतियोगिताओं से लेकर रात के भव्य आयोजन तक जारी रहता है।
एक माह पहले से शुरू होती हैं तैयारियां
बेटमा में दशहरा उत्सव को व्यवस्थित और सुरक्षित ढंग से संपन्न कराने के लिए करीब एक माह पहले से तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। घुड़दौड़ और निशानेबाजी जैसे आयोजनों में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी को देखते हुए प्रशासन और आयोजन से जुड़े लोग व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान देते हैं। पुलिस विभाग सुरक्षा व्यवस्था संभालता है, वहीं राजस्व, लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), स्वास्थ्य, वन और विद्युत विभाग के साथ नगर परिषद एवं ग्राम पंचायत भी अपने-अपने दायित्वों के अनुसार सहयोग करते हैं। भीड़ नियंत्रण के लिए बैरिकेडिंग, सुरक्षा इंतजाम और आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है, ताकि दर्शक उत्सव का आनंद सुरक्षित माहौल में ले सकें।

परंपरा, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक
बेटमा का दशहरा समय के साथ केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नगर की ऐतिहासिक पहचान और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुका है। करीब तीन शताब्दियों से चली आ रही घुड़दौड़ और निशानेबाजी की परंपरा आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ती है। नई पीढ़ी भी इस विरासत को उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही है। यही विशिष्टता बेटमा के दशहरे को खास बनाती है, जहां विजयादशमी पर धर्म और आस्था के साथ शौर्य, रोमांच और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
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