14 घंटे मेहनत, 500 रुपए कमाई!देशभर में ओला-उबर-रैपिडो ड्राइवरों की हड़ताल, क्या हैं गिग वर्कर्स की मांगें?

7 फरवरी को ओला, उबर और रैपिडो से जुड़े गिग ड्राइवरों ने देशव्यापी हड़ताल की। न्यूनतम किराया तय न होने, मनमानी कटौती, अवैध बाइक टैक्सी और निजी वाहनों के कमर्शियल इस्तेमाल के विरोध में ड्राइवरों ने ऐप बंद रखे। इससे बड़े शहरों में कैब और बाइक टैक्सी सेवाएं प्रभावित हुईं।
देशभर में ओला-उबर-रैपिडो ड्राइवरों की हड़ताल, क्या हैं गिग वर्कर्स की मांगें?
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    नई दिल्ली। शनिवार, 7 फरवरी 2026 को देशभर में ओला, उबर और रैपिडो से जुड़े ड्राइवरों ने काम बंद करने का ऐलान किया। इस हड़ताल के तहत ड्राइवरों ने अपने मोबाइल ऐप बंद रखे। जिससे ऑनलाइन कैब, ऑटो और बाइक-टैक्सी बुकिंग बुरी तरह प्रभावित हुई। कई शहरों में सुबह से ही यात्रियों को टैक्सी मिलने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

    इस देशव्यापी आंदोलन को ‘ऑल इंडिया ब्रेकडाउन’ नाम दिया गया है। हड़ताल का आह्वान तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) ने राष्ट्रीय श्रमिक संगठनों और इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) के साथ मिलकर किया है।

    क्यों सड़कों पर उतरे गिग ड्राइवर?

    ड्राइवर संगठनों का कहना है कि, ऐप-आधारित ट्रांसपोर्ट सिस्टम में उनकी स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। न तो सरकार की ओर से कोई न्यूनतम किराया तय किया गया है और न ही प्लेटफॉर्म कंपनियों की मनमानी पर कोई प्रभावी नियंत्रण है।

    ड्राइवरों का आरोप है कि, कंपनियां किराया घटाती जा रही हैं, लेकिन पेट्रोल-डीजल, मेंटेनेंस, बीमा और EMI जैसे सभी खर्च ड्राइवरों पर ही डाल दिए जाते हैं। नतीजा यह है कि काम के घंटे बढ़ रहे हैं, लेकिन कमाई घटती जा रही है।

    कोई न्यूनतम किराया नहीं, कोई रेगुलेशन नहीं

    तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन ने सोशल मीडिया पर साफ शब्दों में कहा कि, कोई न्यूनतम किराया नहीं, कोई रेगुलेशन नहीं, सिर्फ अंतहीन शोषण।

    यूनियन का कहना है कि, मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस-2025 लागू होने के बावजूद सरकारों ने अब तक न्यूनतम बेस फेयर अधिसूचित नहीं किया है। इस खामी का फायदा उठाकर एग्रीगेटर कंपनियां अपने हिसाब से किराया तय कर रही हैं।

    निजी वाहनों और बाइक टैक्सी पर बड़ा विरोध

    हड़ताल की एक बड़ी वजह निजी वाहनों का कमर्शियल इस्तेमाल भी है। यूनियनों का आरोप है कि, बिना कमर्शियल नंबर प्लेट वाले निजी वाहन ऐप के जरिए सवारी ढो रहे हैं, जिससे लाइसेंसधारी ड्राइवरों की रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ रहा है।

    ड्राइवर संगठनों ने बाइक टैक्सी सेवाओं को भी अवैध बताते हुए कहा कि, कई राज्यों में स्पष्ट नीति न होने के बावजूद ये सेवाएं चल रही हैं। हादसों की स्थिति में यात्रियों और ड्राइवरों को बीमा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

    पैनिक बटन डिवाइस बना नई मुसीबत

    महाराष्ट्र कामगार सभा ने इस हड़ताल में एक और अहम मुद्दा उठाया है- अनिवार्य पैनिक बटन डिवाइस।

    ड्राइवरों का कहना है कि, केंद्र सरकार ने जिन कंपनियों को पैनिक बटन डिवाइस के लिए मंजूरी दी, उनमें से कई को राज्य सरकारों ने बाद में अनधिकृत घोषित कर दिया।

    इस वजह से ड्राइवरों को पुराने डिवाइस हटाकर नए डिवाइस लगाने के लिए 10 से 12 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं, जो उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त बोझ डाल रहा है।

    ड्राइवरों की प्रमुख मांगें

    गिग वर्कर्स ने सरकार और ट्रांसपोर्ट मंत्रालय के सामने साफ मांगें रखी हैं-

    • न्यूनतम बेस किराया तुरंत तय किया जाए।
    • एग्रीगेटर गाइडलाइंस-2025 को सख्ती से लागू किया जाए।
    • किराया तय करने से पहले मान्यता प्राप्त यूनियनों से सलाह ली जाए।
    • मनमानी कटौती और पेनल्टी पर रोक लगे।
    • निजी वाहनों के कमर्शियल इस्तेमाल पर सख्त कार्रवाई हो।
    • बाइक टैक्सी नीति स्पष्ट की जाए।
    • ड्राइवरों को बीमा और सामाजिक सुरक्षा मिले।

    कितने ड्राइवर-कितने शहर प्रभावित?

    देशभर में ओला-उबर जैसे प्लेटफॉर्म्स से करीब 35 लाख ड्राइवर जुड़े हुए हैं। रैपिडो के जरिए लाखों बाइक-टैक्सी ड्राइवर भी काम कर रहे हैं।

    कुछ प्रमुख शहरों का आंकड़ा

    शहर

    अनुमानित ड्राइवर

    दिल्ली

    2.5 लाख से ज्यादा

    मुंबई

    2 लाख से ज्यादा

    बेंगलुरु

    1.8 लाख

    हैदराबाद

    1.2 लाख

    भोपाल

    15 हजार कैब

    भोपाल (रैपिडो)

    3 हजार बाइक

    हड़ताल का सबसे ज्यादा असर मेट्रो शहरों में देखने को मिल सकता है।

    आर्थिक सर्वे ने भी जताई चिंता

    आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में गिग इकोनॉमी को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में गिग वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन आय की अस्थिरता बड़ी समस्या बनी हुई है।

    गिग इकोनॉमी से जुड़े अहम आंकड़े

    विवरण

    आंकड़ा

    FY21 में गिग वर्कर्स

    77 लाख

    FY25 में

    1.20 करोड़

    2030 का अनुमान

    2.5 करोड़

    40% गिग वर्कर्स

    ₹15,000 से कम मासिक आय

    लंबे घंटे, कम कमाई की हकीकत

    PAIGAM की 2024 रिपोर्ट गिग वर्कर्स की मुश्किल हकीकत को सामने लाती है। रिपोर्ट के अनुसार, 31 प्रतिशत ऐप-बेस्ड कैब ड्राइवर रोजाना 14 घंटे से अधिक काम करने को मजबूर हैं, इसके बावजूद 43 प्रतिशत ड्राइवरों की दैनिक कमाई सिर्फ 500 रुपए तक ही सीमित रहती है। वहीं, डिलीवरी और बाइक टैक्सी से जुड़े 75 प्रतिशत ड्राइवर रोज 10 घंटे से ज्यादा काम करते हैं। हालात इतने खराब हैं कि, करीब 60 प्रतिशत गिग वर्कर्स के लिए परिवार का रोजमर्रा का खर्च चलाना भी बड़ी चुनौती बन चुका है।

    पहले भी हो चुके हैं ऐसे आंदोलन

    यह पहली बार नहीं है जब गिग वर्कर्स सड़कों पर उतरे हों। 31 दिसंबर 2025 को स्विगी-जोमैटो, ब्लिंकिट और जेप्टो से जुड़े डिलीवरी वर्कर्स ने भी देशव्यापी हड़ताल की थी। उस आंदोलन के बाद कई प्लेटफॉर्म्स को ‘10-मिनट डिलीवरी’ जैसे दावों से पीछे हटना पड़ा था।

    क्या निकलेगा कोई हल?

    यूनियनों ने केंद्र सरकार से तत्काल बातचीत शुरू करने और न्यूनतम किराया अधिसूचित करने की मांग की है। अगर मांगें नहीं मानी गईं, तो आने वाले दिनों में और बड़े आंदोलन की चेतावनी भी दी गई है।

    Manisha Dhanwani
    By Manisha Dhanwani

    मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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