नेपाल में बार-बार क्यों आती है जल प्रलय? जानिए बाढ़ और भूस्खलन के पीछे की बड़ी वजहें

नेपाल में भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचा रखी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस आपदा में अब तक करीब 160 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 844 लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनमें 133 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा सिर्फ भारी बारिश की वजह से नहीं है। इसके पीछे देश का भूगोल, कमजोर पहाड़ी ढलान, बदलता मौसम, पिघलते ग्लेशियर और मानवीय गतिविधियां भी बड़ी वजह हैं। यही कारण है कि मानसून के दौरान नेपाल के कई इलाकों में अचानक बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
पहाड़ी भूगोल बना बड़ी चुनौती
नेपाल बहुत कम दूरी में ऊंचे हिमालय से लेकर अपेक्षाकृत समतल तराई के मैदानों तक फैला हुआ है। देश के कई पहाड़ी इलाकों में ढलान काफी तेज है। ऐसे में जब ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भारी बारिश होती है तो पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। पानी को बड़े इलाके में फैलने का पर्याप्त समय नहीं मिलता और कम समय में बड़ी मात्रा में पानी नदियों और बस्तियों तक पहुंच सकता है। इससे अचानक बाढ़ की स्थिति बन सकती है।

कमजोर और अस्थिर हिमालय
हिमालय भूगर्भीय रूप से अपेक्षाकृत युवा पर्वत श्रृंखला है और आज भी इसमें बदलाव हो रहे हैं। यहां की कई चट्टानें और ढलान अपेक्षाकृत अस्थिर हैं। भारी बारिश के दौरान पानी मिट्टी और चट्टानों के अंदर पहुंच जाता है। इससे उनका वजन बढ़ता है और ढलान की पकड़ कमजोर हो सकती है। नतीजतन भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मुश्किल
बदलते मौसम ने नेपाल के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। मानसून के दौरान कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने की घटनाएं खतरा बढ़ा सकती हैं। अगर कुछ घंटों में ही बड़ी मात्रा में पानी गिरता है तो नदियों और जल निकासी व्यवस्था के लिए उसे संभालना मुश्किल हो सकता है। मिट्टी में ज्यादा पानी भरने से पहाड़ी ढलान भी कमजोर हो जाते हैं और भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है।

पिघलते ग्लेशियर भी बड़ा खतरा
बढ़ते तापमान का असर हिमालय के ग्लेशियरों पर भी पड़ रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने से ऊंचाई वाले इलाकों में हिमनदी झीलों में पानी जमा हो सकता है। इनमें से कुछ झीलें बर्फ, चट्टान और तलछट से बने प्राकृतिक बांधों के पीछे होती हैं। अगर ऐसा बांध टूट जाता है तो बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है। इसे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।
नदियों का बड़ा नेटवर्क
नेपाल में हिमालय और आसपास के क्षेत्रों से निकलने वाली सैकड़ों नदियां और नाले हैं। कोशी, गंडक, करनाली और बागमती जैसी बड़ी नदियां पहाड़ों से पानी मैदानी इलाकों तक पहुंचाती हैं। मानसून के दौरान इनके जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश होने पर जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। अगर एक साथ कई नदियों में पानी का प्रवाह तेज हो जाए तो बाढ़ का खतरा और बढ़ जाता है।

कई बार भूस्खलन के कारण नदी का रास्ता भी बंद हो जाता है। इसके पीछे पानी जमा होने लगता है। अगर यह प्राकृतिक रुकावट अचानक टूट जाए तो जमा पानी तेज बहाव के साथ नीचे की ओर आ सकता है।
निर्माण कार्य भी बढ़ा रहे जोखिम
सड़क, होटल, जल विद्युत परियोजनाओं और दूसरे बुनियादी ढांचे के लिए पहाड़ी ढलानों को काटना पड़ता है। अगर ऐसे निर्माण से पहले उचित भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण नहीं किया जाए और पर्याप्त जल निकासी व ढलान स्थिरीकरण की व्यवस्था न हो तो पहाड़ कमजोर हो सकता है। भारी बारिश के दौरान ऐसी कमजोर ढलानें भूस्खलन की चपेट में आ सकती हैं।

वनों की कटाई से बढ़ता कटाव
पहाड़ी ढलानों को स्थिर रखने में जंगलों की अहम भूमिका होती है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को मजबूती से बांधकर रखती हैं। वहीं पेड़ और वनस्पति बारिश के पानी की रफ्तार को भी कम करते हैं। जब जंगल हट जाते हैं तो बारिश का पानी सीधे मिट्टी पर गिरता है और तेजी से बहने लगता है। इससे मिट्टी का कटाव बढ़ता है और बड़ी मात्रा में तलछट नदियों में पहुंच सकती है। भारी बारिश, ढीली मिट्टी और कमजोर ढलानों का यह मेल बाढ़ और भूस्खलन दोनों का खतरा बढ़ा देता है।
कई कारण मिलकर बनाते हैं बड़ा खतरा
नेपाल की आपदा संवेदनशीलता को किसी एक वजह से नहीं समझा जा सकता। पहाड़ी भूगोल, अस्थिर ढलान, तेज बारिश, जलवायु परिवर्तन, पिघलते ग्लेशियर, नदियों का बड़ा नेटवर्क और अनियोजित निर्माण जैसी कई वजहें एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ाती हैं। इसी वजह से मानसून के दौरान नेपाल के पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों में अचानक बाढ़, भूस्खलन और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा काफी बढ़ जाता है।


















