भूकंप नहीं, ग्लेशियर बना आफत की वजह? नेपाल में आखिर कैसे आई इतनी भयानक बाढ़! ISRO ने सैटेलाइट तस्वीरों से समझाया नेपाल का संकट

काठमांडू। नेपाल के रसुवा इलाके में आई फ्लैश फ्लड ने कुछ ही समय में सड़कों, पुलों, इमारतों और कई बस्तियों को नुकसान पहुंचाया। नेपाल के ताजा आंकड़ों के अनुसार 165 शव बरामद किए जा चुके हैं और 826 लोग अब भी लापता हैं। इनमें बड़ी संख्या में पर्यटक और सुरक्षा कर्मी भी शामिल हैं। शुरुआती वैज्ञानिक आकलन में बाढ़ की मुख्य वजह ग्लेशियर से जुड़े बर्फ और चट्टानों के अचानक खिसकने को बताया गया है। वहीं, घटना के आसपास भूकंपीय हलचल भी दर्ज हुई थी, जिसके कारण शुरुआत में इसे भूकंप से जोड़कर देखा गया। बाद के विश्लेषण में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने इसे ग्लेशियर के ढहने से जुड़ी घटना बताया है।
आखिर अचानक इतना पानी कहां से आया?
घटना का केंद्र नेपाल-चीन सीमा के पास रसुवा का पहाड़ी इलाका है। शुरुआती जांच के अनुसार ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर से बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा नीचे की ओर गिरा। इससे ल्हेंडे खोला नदी का रास्ता मलबे से रुक गया। पानी कुछ समय के लिए पीछे जमा हुआ और फिर अवरोध टूटने पर तेज रफ्तार से नीचे की ओर बह निकला।
ग्लेशियर गिरा तो बना मलबे का बांध
ऊंचे पहाड़ों से गिरने वाली बर्फ, पत्थर और मिट्टी जब नदी में पहुंचती है तो वह पानी का रास्ता रोक सकती है। इस घटना में भी ऐसा ही होने की संभावना जताई गई है। मलबे से बनी अस्थायी रुकावट के पीछे पानी जमा होता गया। जब यह रुकावट टूटी तो पानी के साथ भारी मात्रा में कीचड़ और चट्टानें भी नीचे आईं। इसी वजह से बाढ़ की ताकत सामान्य बारिश की बाढ़ से कहीं ज्यादा रही।
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कुछ मिनटों में कई मीटर बढ़ा नदी का पानी
ल्हेंडे खोला से निकला तेज बहाव भोटेकोशी नदी तक पहुंचा और फिर आगे त्रिशूली नदी में गया। वैज्ञानिकों के अनुसार त्रिशूली नदी के कुछ हिस्सों में पानी का स्तर करीब 30 मिनट में 7 से 9 मीटर तक बढ़ गया। इतनी तेजी से पानी बढ़ने के कारण नदी किनारे रहने वाले लोगों को संभलने का मौका बहुत कम मिला।
क्या भूकंप बना था बाढ़ की वजह?
इस सवाल पर अभी भी चर्चा जारी है। घटना के आसपास भूकंपीय गतिविधि दर्ज होने के बाद शुरुआत में इसे 4.4 तीव्रता के भूकंप से जोड़ा गया था। चीन के राजदूत ने भी शुरुआती जानकारी के आधार पर भूकंप को ग्लेशियर खिसकने से जोड़ने की बात कही। लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने बाद के विश्लेषण में कहा कि दर्ज हुई हलचल वास्तव में ग्लेशियर के ढहने और बर्फ-चट्टान के मलबे से पैदा हुई थी, न कि सामान्य भूकंप।
सैटेलाइट तस्वीरों ने भी दिए बड़े संकेत
प्लैनेट लैब्स की सैटेलाइट तस्वीरों और दूसरे शुरुआती विश्लेषणों में नदी के आसपास मलबे और भूभाग में बड़े बदलाव दिखाई दिए। तस्वीरों से यह समझने में मदद मिली कि ऊपर से आया मलबा किस तरह नदी के रास्ते में पहुंचा और फिर बाढ़ का बहाव नीचे की तरफ बढ़ा। सैटेलाइट डेटा से आपदा के बाद प्रभावित इलाके का तेजी से आकलन करना संभव हुआ।
तबाही कितनी बड़ी?
बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों में भारी नुकसान किया है। ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार 35 मोटर योग्य पुल, 45 सस्पेंशन ब्रिज और करीब 40 किलोमीटर सड़कें प्रभावित हुई हैं। 579 पर्यटक अब भी लापता बताए गए हैं। राहत और बचाव दल मुश्किल पहाड़ी इलाकों में लगातार तलाशी अभियान चला रहे हैं।
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हिमालय में क्यों बढ़ रहा ऐसा खतरा?
हिमालय में ऊंची ढलानें, ग्लेशियर और तेजी से बदलता मौसम प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ाते हैं। बर्फ और चट्टानों के अचानक खिसकने से नदी का रास्ता रुक सकता है और कुछ ही समय बाद पानी का बड़ा सैलाब नीचे आ सकता है। रसुवा की घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि पहाड़ी इलाकों में ऐसी आपदाओं की निगरानी और समय पर चेतावनी कितनी जरूरी है।


















