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जजों का ट्रांसफर सरकार का काम नहीं…SC जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का बड़ा बयान, बोले- संविधान सर्वोच्च है

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि, हाई कोर्ट जजों का ट्रांसफर न्यायपालिका का आंतरिक मामला है। इसमें केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सरकार के खिलाफ फैसले देने वाले जजों के तबादले को न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हस्तक्षेप बताया। बयान पुणे के ILS लॉ कॉलेज में जीवी पंडित मेमोरियल लेक्चर के दौरान दिया गया।
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SC जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का बड़ा बयान, बोले- संविधान सर्वोच्च है
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    पुणे। भारत की न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा संवैधानिक विवाद सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने हाई कोर्ट जजों के तबादले (ट्रांसफर) को लेकर साफ शब्दों में कहा है कि, यह पूरी तरह न्यायपालिका का आंतरिक मामला है। जिसमें केंद्र सरकार या कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि, सरकार के खिलाफ फैसले देने वाले जजों का तबादला करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हस्तक्षेप है और इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद कमजोर होती है।

    जस्टिस भुइयां ने यह बयान पुणे के ILS लॉ कॉलेज में आयोजित प्रिंसिपल जीवी पंडित मेमोरियल लेक्चर के दौरान दिया। उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम, न्यायिक स्वतंत्रता और कार्यपालिका के प्रभाव पर खुलकर अपनी बात रखी।

    ट्रांसफर न्यायपालिका का विषय है, सरकार का नहीं

    अपने भाषण में जस्टिस भुइयां ने दो टूक कहा कि, हाई कोर्ट जजों के ट्रांसफर और पोस्टिंग पूरी तरह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसमें सरकार या केंद्र की कोई भूमिका नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि, यदि किसी जज का तबादला सिर्फ इसलिए किया जाता है क्योंकि उसने सरकार के लिए असहज या कठिन फैसले दिए हैं, तो यह सीधे तौर पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है।

    क्या असहज आदेशों की सजा ट्रांसफर है?

    जस्टिस भुइयां ने एक बेहद गंभीर सवाल उठाया- क्या किसी जज को सिर्फ इसलिए एक हाई कोर्ट से दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर किया जाना चाहिए, क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कुछ मुश्किल आदेश पारित किए?

    उन्होंने कहा कि ऐसी सोच-

    • न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करती है।
    • कॉलेजियम सिस्टम की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है।
    • जनता के न्याय व्यवस्था पर भरोसे को नुकसान पहुंचाती है।

    कॉलेजियम सिस्टम पर सीधी आलोचना

    जस्टिस भुइयां ने कॉलेजियम प्रक्रिया में कार्यपालिका के दखल को लेकर खुली आलोचना करते हुए कहा कि, जब कॉलेजियम के प्रस्ताव में ही यह दर्ज हो कि किसी जज का ट्रांसफर केंद्र सरकार के पुनर्विचार अनुरोध के बाद किया गया, तो यह कॉलेजियम सिस्टम की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    उन्होंने इसे कार्यपालिका के प्रभाव की खुली स्वीकारोक्ति बताया और कहा कि, यह एक संवैधानिक रूप से स्वतंत्र मानी जाने वाली प्रक्रिया को कमजोर करता है।

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    भारत में संसद नहीं, संविधान सर्वोच्च है

    अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने संविधान की सर्वोच्चता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि, भारत में संसद सर्वोच्च नहीं है, संविधान सर्वोच्च है। उन्होंने याद दिलाया कि, संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर संविधान की सर्वोच्चता को चुना था, ताकि किसी भी संस्था का वर्चस्व लोकतंत्र के संतुलन को नुकसान न पहुंचा सके।

    जस्टिस अतुल श्रीधरन ट्रांसफर केस

    यह पूरा विवाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले से जुड़ा है।

    क्या हुआ था?

    अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से बदलकर इलाहाबाद हाई कोर्ट करने की सिफारिश की। कॉलेजियम के आधिकारिक बयान में यह दर्ज था कि, यह बदलाव केंद्र सरकार के पुनर्विचार अनुरोध के बाद किया गया।

    सीनियरिटी और भूमिका का भी नुकसान

    यह फैसला इसलिए भी विवादास्पद बना क्योंकि, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जस्टिस श्रीधरन सीनियरिटी के आधार पर कॉलेजियम का हिस्सा बनते, जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट में उनकी सीनियरिटी काफी नीचे चली गई। यानी यह सिर्फ स्थान परिवर्तन नहीं था, बल्कि संस्थागत भूमिका और प्रभाव में गिरावट भी थी।

    क्यों स्वतंत्र जज माने जाते हैं जस्टिस श्रीधरन?

    जस्टिस अतुल श्रीधरन की पहचान एक स्वतंत्र, निर्भीक और सख्त जज के रूप में रही है। अपने न्यायिक करियर के दौरान उन्होंने कई ऐसे फैसले दिए, जिनमें सत्ता पक्ष के खिलाफ सख्त रुख साफ दिखाई दिया। उनके चर्चित मामलों में BJP मंत्री विजय शाह के खिलाफ लिया गया स्वत: संज्ञान प्रमुख रूप से शामिल है।

    इस मामले में उन्होंने कर्नल सोफिया कुरैशी पर की गई टिप्पणी को गंभीर मानते हुए स्वत: संज्ञान लेकर FIR दर्ज करने का आदेश दिया था। यह फैसला सरकार के लिए असहज माना गया, जिसके बाद उनके तबादले को लेकर विवाद और गहरा गया तथा इसे न्यायिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाने लगा।

    जजों को अपनी शपथ पर कायम रहना चाहिए

    जस्टिस भुइयां ने कहा कि, जब न्यायपालिका ने NJAC (नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन) को खारिज कर कॉलेजियम सिस्टम को बनाए रखा, तब जजों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष बनी रहे। उन्होंने कहा, जजों ने संविधान को बिना डर और बिना पक्षपात के निभाने की शपथ ली है और उन्हें उस शपथ पर कायम रहना चाहिए।

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    Manisha Dhanwani
    By Manisha Dhanwani

    मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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