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160 करोड़ के अवॉर्ड पर हाईकोर्ट की दो टूक,अफसरों की जेब से नहीं होगी वसूली

मध्यस्थता अवॉर्ड की रकम सरकारी विभाग से वसूल होगी, अधिकारियों पर व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी डालना गलत; शपथपत्र-अंडरटेकिंग और अवमानना की धमकी वाले निर्देश रद्द,छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 160.30 करोड़ के मध्यस्थता अवॉर्ड की वसूली से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि निष्पादन न्यायालय सरकारी विभाग के अधिकारियों पर व्यक्तिगत वित्तीय देनदारी नहीं डाल सकता।
160 करोड़ के अवॉर्ड पर हाईकोर्ट की दो टूक,अफसरों की जेब से नहीं होगी वसूली

रायपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 160 करोड़ से ज्यादा के मध्यस्थता अवॉर्ड की वसूली के मामले में सरकारी अधिकारियों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने साफ किया कि विभाग के खिलाफ पारित अवॉर्ड की रकम के लिए अधिकारियों पर व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। हालांकि, अवॉर्ड की कानूनी वसूली की प्रक्रिया जारी रहेगी।

बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने करीब 160.30 करोड़ के मध्यस्थता अवॉर्ड की वसूली से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने साफ किया कि निष्पादन न्यायालय किसी सरकारी विभाग के अधिकारी पर ऐसी व्यक्तिगत वित्तीय देनदारी नहीं डाल सकता, जो मूल मध्यस्थता अवॉर्ड में उसके खिलाफ तय ही नहीं हुई है। 

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अधिकारियों से मांगे गए थे शपथपत्र

मामले में लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने और भुगतान की स्थिति बताने के निर्देश दिए गए थे। अधिकारियों से शपथपत्र और अंडरटेकिंग लेने तथा भुगतान नहीं होने की स्थिति में व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी और अवमानना कार्रवाई की बात भी सामने आई थी

बस्तर में सड़क निर्माण से जुड़ा मामला

पूरा विवाद बस्तर जिले के वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग-63 के विभिन्न हिस्सों में दो लेन सड़क निर्माण परियोजना से जुड़ा है। केंद्र सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने परियोजना के लिए पहले 169.23 करोड़ की प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति दी थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 211.53 करोड़ किया गया।

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190 करोड़ के अतिरिक्त दावे से शुरू हुआ विवाद

परियोजना का क्रियान्वयन राज्य के लोक निर्माण विभाग के माध्यम से हुआ। निर्माण कार्य 30 जून 2019 को पूरा होने के बाद ठेकेदार ने करीब 190.33 करोड़ के अतिरिक्त भुगतान का दावा किया। विभाग ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया, जिसके बाद विवाद मध्यस्थता तक पहुंचा।

2 सितंबर 2022 को आया ₹160.30 करोड़ का अवॉर्ड

मामले में एकल मध्यस्थ की नियुक्ति के बाद राज्य की ओर से पर्याप्त अधिकृत प्रतिनिधित्व और कानूनी सहायता उपलब्ध नहीं होने के बीच एकतरफा कार्यवाही हुई। इसके बाद 2 सितंबर 2022 को 160 करोड़ 30 लाख 11 हजार 411 रुपये का मध्यस्थता अवॉर्ड पारित किया गया।

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अवॉर्ड की वसूली के लिए पहुंचा मामला

अवॉर्ड के बाद ठेकेदार ने राशि की वसूली के लिए वाणिज्यिक न्यायालय में निष्पादन प्रकरण दायर किया। राज्य सरकार ने अवॉर्ड को चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन धारा 34 के तहत आवेदन समय-सीमा के आधार पर खारिज हो गया।

हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती

इसके बाद मध्यस्थता अधिनियम की धारा 37 के तहत चुनौती भी हाईकोर्ट ने 10 जून 2024 को खारिज कर दी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 को 484 दिन की देरी के आधार पर विशेष अनुमति याचिका भी खारिज कर दी। इसके बाद अवॉर्ड की वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

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बैंक खातों और फंड की जानकारी भी मांगी

निष्पादन न्यायालय ने भुगतान में देरी को लेकर पीडब्ल्यूडी के वरिष्ठ अधिकारियों से व्यक्तिगत उपस्थिति मांगी। अधिकारियों से परियोजना खातों, बैंक खातों, प्राप्त राशि, उपलब्ध शेष रकम और भुगतान के लिए किए गए प्रयासों सहित वित्तीय जानकारी प्रस्तुत करने को कहा गया।

22 जून के आदेश पर हाईकोर्ट में चुनौती

22 जून 2026 के आदेश में पीडब्ल्यूडी सचिव, इंजीनियर-इन-चीफ और मुख्य अभियंता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर भुगतान की प्रक्रिया और संभावित समयसीमा बताने को कहा गया था। भुगतान नहीं होने की स्थिति में अवमानना कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना भी जताई गई थी।

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धारा 36 के तहत होगी अवॉर्ड की वसूली

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता अवॉर्ड अंतिम रूप ले चुका है और उसकी वसूली कानून के अनुसार की जा सकती है। मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम की धारा 36 के तहत अवॉर्ड को सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत डिक्री की तरह लागू किया जाता है।

सरकारी अधिकारी और विभागीय देनदारी में अंतर

कोर्ट ने कहा कि यदि अवॉर्ड किसी सरकारी विभाग या प्राधिकरण के खिलाफ है, तो निष्पादन न्यायालय संबंधित सक्षम अधिकारी से विभाग की संपत्ति, धनराशि, स्वीकृति और भुगतान के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांग सकता है। लेकिन केवल इस आधार पर कि अधिकारी विभाग में पदस्थ है, उस पर व्यक्तिगत भुगतान की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

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शपथपत्र-अंडरटेकिंग पर भी कोर्ट की रोक

हाईकोर्ट ने अधिकारियों से व्यक्तिगत भुगतान का वादा करने वाले शपथपत्र या अंडरटेकिंग लेने और भुगतान नहीं होने पर उन पर ब्याज समेत व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी तय करने की धमकी को उचित नहीं माना। ऐसे निर्देश मूल अवॉर्ड में तय देनदारी की सीमा से बाहर नहीं जा सकते।

पुनर्विचार याचिका पर भी अहम टिप्पणी

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबित पुनर्विचार याचिका के आधार पर निष्पादन न्यायालय को उसकी सफलता या संभावित परिणाम को लेकर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। हालांकि केवल पुनर्विचार याचिका लंबित रहने से मध्यस्थता अवॉर्ड पर स्वतः रोक नहीं लगती।

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अधिकारियों को मिली राहत, वसूली पर नहीं लगी रोक

जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अधिकारियों से व्यक्तिगत शपथपत्र या अंडरटेकिंग लेने, व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी डालने और केवल भुगतान नहीं होने के आधार पर अवमानना कार्रवाई की प्रक्रिया से जुड़े निर्देशों को निरस्त कर दिया। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवॉर्ड की वसूली की कार्रवाई बंद नहीं होगी। निष्पादन न्यायालय धारा 36 और आदेश 21 के तहत कानून के अनुरूप आगे की कार्रवाई जारी रख सकता है। 

PREM

मै प्रेम निर्मलकर मैने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से की, विगत 18 वर्षों से मुझे पत...Read More

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