शराब कारोबारी सुसाइड केस में फैसला: हाईकोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपी

इंदौर - हाईकोर्ट इंदौर बेंच ने शराब कारोबारी दिनेश मकवाना आत्महत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए जांच सीबीआई को सौंप दी है। कोर्ट ने कहा कि मामले में प्रथम दृष्टया एफआईआर दर्ज करने और निष्पक्ष जांच के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद थी, लेकिन स्थानीय पुलिस ने जानबूझकर कार्रवाई नहीं की। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की एकल पीठ ने यह आदेश मृतक के पिता संतोष मकवाना की याचिका पर दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि उनके बेटे दिनेश मकवाना ने आबकारी विभाग की तत्कालीन सहायक आयुक्त मंदाकिनी दीक्षित की कथित रिश्वत मांग और प्रताड़ना से परेशान होकर 8 नवंबर 2025 को सेल्फॉस खाकर आत्महत्या कर ली थी।
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“एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई”
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि 29 नवंबर 2025 को पुलिस को सुसाइड वीडियो सौंप दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि जांच केवल साइबर फोरेंसिक रिपोर्ट तक सीमित रखी गई, जिसमें यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि वीडियो संबंधित मोबाइल से रिकॉर्ड हुआ था या नहीं। कोर्ट ने कहा कि केवल तकनीकी आधार पर सुसाइड वीडियो को खारिज नहीं किया जा सकता। आदेश में यह भी कहा गया कि पुलिस की भूमिका संदिग्ध दिखाई देती है और ऐसा प्रतीत होता है कि मामले को दबाने की कोशिश की गई।
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“वीडियो पुराना होने से आरोप खत्म नहीं हो जाते”
प्रतिवादी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि सुसाइड वीडियो दशहरे से पहले रिकॉर्ड किया गया था, जबकि आत्महत्या नवंबर में हुई। इसलिए दोनों घटनाओं के बीच तत्काल संबंध नहीं माना जा सकता। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या की मानसिक स्थिति तक पहुंच चुका हो, तो केवल इस आधार पर आरोपों को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता कि उसने वीडियो रिकॉर्ड करने के तुरंत बाद जान नहीं दी। संभव है कि उसने बाद में दोबारा विचार किया हो, लेकिन अंततः परिस्थितियों से मजबूर होकर आत्महत्या की हो।
निजी फोरेंसिक रिपोर्ट पर भी कोर्ट सख्त
मंदाकिनी दीक्षित की ओर से एक निजी विशेषज्ञ की रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें वीडियो को एडिटेड और टैंपर बताया गया। कोर्ट ने कहा कि जांच के शुरुआती चरण में निजी रिपोर्ट के आधार पर सुसाइड वीडियो को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
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समझौते वाला वीडियो भी बना अहम सबूत
याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने एक अन्य वीडियो भी पेश किया, जिसमें कथित तौर पर मंदाकिनी दीक्षित मॉल में परिवार से समझौते की बात करती नजर आ रही हैं। वीडियो में मृतक के बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने की बात भी कही गई। कोर्ट ने इसे भी महत्वपूर्ण सामग्री माना।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सीबीआई जांच असाधारण परिस्थितियों में ही कराई जाती है, लेकिन जब जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठें और प्रथम दृष्टया अपराध दिखाई दे, तब अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। कोर्ट ने आदेश दिया कि कनाड़िया थाना तत्काल पूरा मामला सीबीआई को सौंपे। साथ ही सीबीआई को स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कर मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।
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सुसाइड वीडियो में लगाए थे गंभीर आरोप
कोर्ट के सामने पेश वीडियो क्लिप में दिनेश मकवाना ने आरोप लगाया था कि देवास जिले में उनकी शराब दुकानों के तीन ग्रुप थे और आबकारी अधिकारी मंदाकिनी दीक्षित हर दुकान से डेढ़ लाख रुपए प्रतिमाह मांग रही थीं। वीडियो में यह भी कहा गया कि प्रति शराब बोतल पर 10 रुपए कमीशन मांगा जाता था और अब तक 20 से 22 लाख रुपए दिए जा चुके थे। दिनेश ने आरोप लगाया कि पैसे नहीं देने पर वेयरहाउस से शराब की सप्लाई रुकवा दी जाती थी।












