NCRB Report : हत्या किए बच्चों में बेटियां अधिक, त्यागने और भ्रूण हत्या के मामले में भी मध्यप्रदेश सबसे ऊपर

पल्लवी वाघेला, भोपाल। बेटी बचाओ के नारे, समाज में बेटियों को लेकर सोच बदलने के तमाम दावे और सरकारी अभियानों के बावजूद, समाज में लिंग आधारित भेदभाव अब भी बरकरार है। ये खुलासा हुआ है नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट में। यह बताते हैं कि मप्र में बेटियों को लेकर भेदभाव और उपेक्षा की मानसिकता आज भी कई घरों में जिंदा है। रिपोर्ट के अनुसार मप्र में वर्ष 2024 के दौरान बच्चों की हत्या के 125 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 64 फीसदी लड़कियां थीं। वहीं, बच्चों को त्यागने और भ्रूण हत्या के मामले में भी मप्र देश में नंबर वन पर है। विशेषज्ञ इसे केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता से जुड़ी गंभीर समस्या मान रहे हैं।
देश में दूसरा नंबर
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में मप्र में 125 बच्चों की हत्या के मामले दर्ज किए गए। यह आंकड़ा देश में यूपी (205 हत्या) के बाद सबसे अधिक है। वहीं, 125 मारे गए बच्चों में 81 लड़कियां थी। इनमें भी 16 बच्चियों की हत्या, दुष्कर्म के बाद की गई। यह आंकड़ा केवल अपराध नहीं, बल्कि समाज की उस सोच को भी उजागर करता है जिसमें बेटियां अब भी कई बार बोझ समझी जाती हैं।
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बच्चों को त्यागने में लगातार छठवें साल पहले नंबर पर
बच्चों की हत्या के अलावा बच्चों को त्यागने के मामले में भी प्रदेश की स्थिति चिंताजनक है। आंकड़े थोड़े घटे या बढ़े लेकिन बीते छह सालों से बच्चों को त्यागने के मामले में मप्र, देश में पहले नंबर पर बना हुआ है। साल 2024 में प्रदेश में 146 बच्चों को त्यागने के मामले सामने आए। इनमें नवजात बच्चियों को झाड़ियों, अस्पतालों, सड़कों, और सार्वजनिक स्थानों पर मरने छोड़ देने जैसी घटनाएं शामिल हैं। वहीं कई मामलों में बच्चों को जन्म के तुरंत बाद लावारिस हालत में पाया गया।
भ्रूण हत्या के घटे मामले
मप्र में भ्रूण हत्या के मामलों में बीते सालों के मुकाबले काफी कमी आई है, लेकिन देश में अब भी यह सबसे अधिक हैं। साल 2023 में जहां 56 भ्रूण हत्या के मामले थे। वहीं अब यह घटकर 27 रह गए हैं।

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बेटियों को जन्म से पहले मारना चिंताजनक
रिपोर्ट में जो आंकड़े आए हैं वह दर्ज मामले में कुछ कैटेगरी में इनकी संख्या अधिक भी हो सकती है। भ्रूण परीक्षण पर प्रतिबंध और सख्त कानून होने के बावजूद बेटियों को जन्म से पहले ही खत्म करने की घटनाएं समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। यह सोच शहरों में भी मौजूद है। आर्थिक दबाव, दहेज की चिंता, पितृसत्तात्मक सोच और बेटे की चाह जैसी वजहें अब भी कई परिवारों में बेटियों के प्रति नकारात्मक रवैये को जन्म देती है। केवल कानून बनाने से स्थिति नहीं बदलेगी, बल्कि शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक जागरूकता के जरिए ही इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।
मोनिका आर्य, सामाजिक कार्यकर्ता, पा-लो-ना अभियान फाउंडर












