चंद्रमा पर इतिहास रचने को तैयार HPE का सुपरकंप्यूटर, पहली बार होगा AI और GPU का परीक्षण

सैक्रामेंटो (कैलिफोर्निया)। कंप्यूटिंग की दुनिया इस साल के अंत में एक बड़ा इतिहास बनाने जा रही है। कैलिफोर्निया बेस्ड स्पेस कंपनी एस्ट्रोलैब अपने अनक्रूड लूनर रोवर FLIP को चंद्रमा पर भेजने वाली है। इस रोवर में ह्यूलेट पैकार्ड एंटरप्राइज (HPE) का एडवांस्ड स्पेसबोर्न कंप्यूटर-4 इंस्टॉल होगा। यह पहला मौका होगा जब चंद्रमा की सतह पर हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित प्रयोग सीधे तौर पर किए जाएंगे। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डीप स्पेस में नेक्स्ट-जेन कंप्यूटिंग हार्डवेयर की टेस्टिंग, चंद्रमा पर भविष्य के मानव बस्ती और लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक एक्टिविटी के लिए एक अहम माइलस्टोन साबित होगी। वहीं, NASA भी अपने आर्टेमिस प्रोग्राम के जरिए इंसानों को फिर से चंद्रमा पर भेजने की तैयारी में है।
चंद्रमा पर एज कंप्यूटिंग का ट्रायल और स्पेसबोर्न कंप्यूटर-4 की खासियत
यह मिशन ग्रिफिन मिशन 1 (Griffin-1) का हिस्सा है, जिसके तहत FLIP रोवर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंड करेगा। Space.com की रिपोर्ट के अनुसार, NASA ने आर्टेमिस मिशन के लिए मानव द्वारा चलाए जा सकने वाले रोवर के डेवलपमेंट के लिए जिन दो प्राइवेट कंपनियों का चयन किया है, उनमें एस्ट्रोलैब भी शामिल है। इसी महीने की शुरुआत में कंपनी हेडक्वार्टर में हुए एक मीडिया इवेंट में एस्ट्रोलैब के फाउंडर और CEO जैरेट मैथ्यूज ने कहा- हम इस साल के अंत में HPE का पहला सुपरकंप्यूटर चंद्रमा की सतह पर भेज रहे हैं। इसके साथ ही चंद्रमा पर पहली बार GPU का इस्तेमाल होगा और AI से जुड़े एक्सपेरिमेंट किए जाएंगे। वे नया रास्ता बना रहे हैं और अपनी फील्ड में लीड कर रहे हैं।
चंद्रमा के कठोर माहौल के लिए कैसे तैयार है सुपरकंप्यूटर
अंतरिक्ष के एक्सट्रीम एनवायरनमेंट में सर्वाइव करने के लिए HPE के स्पेसबोर्न कंप्यूटर-4 को बहुत हल्का, कॉम्पैक्ट, फैन-लेस और सेल्फ-रिलायंट बनाया गया है। इस सिस्टम में लो-पावर कंजम्पशन वाला 64-बिट CPU दिया गया है, जिसमें इंटीग्रेटेड GPU मौजूद है। इसके साथ ही इसमें मेमोरी एक्सपर्ट KIOXIA की सॉलिड-स्टेट ड्राइव (SSD) लगी है। पूरे सिस्टम को एक स्पेशल एल्युमिनियम हाउसिंग में पैक किया गया है जो हीट को बाहर निकालने में सक्षम है। यह हाउसिंग सीधे रोवर के कूलिंग सिस्टम से कनेक्ट है। रोवर को पावर उसके ऑनबोर्ड सोलर सेल और बैटरी से मिलेगा। हालांकि, इस मिशन का सबसे बड़ा टेक्निकल ऑब्जेक्टिव यह साबित करना है कि यह कंप्यूटर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के सबसे कठिन वातावरण में भी काम कर सकता है।
एक साल तक ऑपरेशनल रहने के लिए डिजाइन किया
एस्ट्रोलैब के CEO जैरेट मैथ्यूज ने कहा, हमने इसे इस तरह डिजाइन किया है कि यह चंद्रमा की सतह पर पूरे एक साल तक ऑपरेशनल रहे। इसके लिए इसे कई लूनर नाइट्स से गुजरना होगा, जहां 150 घंटे से ज्यादा समय तक पूरी तरह अंधेरा रहता है। सूर्य से न तो एनर्जी मिलती है और न ही गर्मी। मैथ्यूज ने आगे बताया कि जब एस्ट्रोनॉट्स मौजूद नहीं होंगे तब भी रोवर को लंबे समय तक ऑटोनॉमस मोड में काम करना होगा। हमें एक सेमी-ऑटोनॉमस प्लेटफॉर्म बनाना है जो कई महीनों तक लगातार काम करे और सैकड़ों किलोमीटर की दूरी कवर करे।
सिर्फ मजबूती ही नहीं, स्मार्ट काम भी करेगा यह कंप्यूटर
यह सुपरकंप्यूटर सिर्फ टिकाऊ ही नहीं, बल्कि इंटेलिजेंट भी होगा। यह यात्रा के दौरान कैप्चर किए गए विजुअल डेटा यानी वीडियो और तस्वीरों को प्रोसेस करेगा, खुद से ऑब्जर्वेशन करेगा, टेरेन को समझने में मदद करेगा और चंद्रमा की हाई-रिजॉल्यूशन मैपिंग करेगा।HPE ने अपने बयान में कहा है-एक AI सर्विस कंटेनर चंद्रमा पर AI एप्लिकेशन को भरोसेमंद तरीके से डिप्लॉय करके दिखाएगा। कंपनी के मुताबिक, यह डेमोस्ट्रेशन भविष्य के ह्यूमन मिशन और डीप स्पेस में AI के इस्तेमाल के लिए फाउंडेशन तैयार करेगा।
मंगल ग्रह की नेविगेशन तकनीक करेगी चंद्रमा पर रास्ता खोजने में मदद
चंद्रमा पर GPS जैसी कोई ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम नहीं है, इसलिए सतह पर नेविगेशन सबसे बड़ी टेक्निकल चुनौतियों में से एक है।इस चैलेंज से निपटने के लिए एस्ट्रोलैब उसी सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रहा है, जिसे मूल रूप से NASA की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) ने मंगल मिशन के लिए डेवलप किया था। मैथ्यूज ने आगे बताया- चंद्रमा पर मौजूद स्पेस-कंप्यूटर पर किए जाने वाले प्रयोगों में JPL का लोकलाइजेशन सॉफ्टवेयर भी शामिल है। इस तकनीक का इस्तेमाल पहले मंगल ग्रह पर किया जा चुका है, लेकिन अब पहली बार इसे चंद्रमा पर आजमाया जाएगा। यह सिस्टम मशीन लर्निंग एल्गोरिदम की मदद से काम करता है। यह रोवर के पास मौजूद मैप डेटा की तुलना उसके आसपास के नजारों से मिलने वाले रियल-टाइम विजुअल डेटा से करता है। आसपास दिखाई देने वाले लैंडमार्क (प्रमुख स्थानों) का मिलान अपनी इंटरनल मेमोरी में मौजूद डेटा से करके रोवर मैप पर अपनी सटीक लोकेशन का पता लगा सकता है। इससे वह GPS सिग्नल के बिना भी रास्ते में मौजूद खतरनाक गड्ढों से बचते हुए आगे बढ़ सकता है।




















