PU Special :ग्वालियर का शाही दशहरा: सिंधिया परिवार की 400 साल पुरानी परंपरा, तलवार से शमी वृक्ष को छूकर लूटा जाता है ‘सोना’

अम्बरीश आनंद, ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में दशहरा केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व नहीं बल्कि ऐतिहासिक राजपरंपराओं और जनआस्था का भी प्रतीक है। यहां सिंधिया राजपरिवार की ओर से विजयादशमी पर शमी पूजन और ‘सोने की लूट’ की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। करीब 300 से 400 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा में शमी वृक्ष की पत्तियों को सोने का प्रतीक माना जाता है। पूजा के बाद राजपरिवार के मुखिया अपनी पारंपरिक तलवार से शमी वृक्ष की डाल को स्पर्श करते हैं। इसके बाद वहां मौजूद लोग पत्तियां लेने के लिए आगे बढ़ते हैं और इन्हें एक-दूसरे को शुभकामना के रूप में भेंट करते हैं। इस परंपरा की शुरुआत ग्वालियर के गोरखी स्थित देवघर से मानी जाती है। बाद में इसका आयोजन मांढरे की माता मंदिर के पास दशहरा मैदान में होने लगा। आज भी यह आयोजन मराठा विरासत, शस्त्र पूजा और विजयादशमी की धार्मिक मान्यताओं को एक साथ जोड़ता है।
क्या है ग्वालियर के शाही दशहरे की परंपरा?
ग्वालियर के शाही दशहरे की सबसे खास बात शमी पूजन और सोने की लूट की रस्म है। दशहरे के दिन सिंधिया परिवार के सदस्य सबसे पहले गोरखी स्थित देवघर में कुलदेवता और ऐतिहासिक शस्त्रों की पूजा करते हैं। इसके बाद वे मांढरे वाली माता के मंदिर के पास स्थित दशहरा मैदान पहुंचते हैं, जहां शमी पूजन की परंपरा निभाई जाती है। पूजा के दौरान शमी वृक्ष की डाल को पारंपरिक तलवार से स्पर्श किया जाता है। इसके बाद वृक्ष से गिरने वाली पत्तियों को वहां उपस्थित लोग उठाते हैं। इन पत्तियों को ‘सोना पत्ती’ कहा जाता है क्योंकि इन्हें सोने का प्रतीक माना जाता है। लोग इन पत्तियों को अपने परिवार के सदस्यों, मित्रों और परिचितों को भेंट करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से सुख-समृद्धि आती है। कई लोग इन पत्तियों को शुभ प्रतीक के रूप में अपनी तिजोरी या घर में भी संभालकर रखते हैं।
महाराजा दौलतराव सिंधिया के समय से जुड़ी परंपरा
ग्वालियर के शाही दशहरे की ऐतिहासिक जड़ें मराठा शासन और सिंधिया राजपरिवार की परंपराओं से जुड़ी हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण के मुताबिक 18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान महाराजा दौलतराव सिंधिया के समय लश्कर को राजधानी के रूप में विकसित किए जाने के साथ इस शाही परंपरा को विशेष महत्व मिला। मराठा काल में विजयादशमी केवल धार्मिक उत्सव नहीं थी। इसे सैन्य अभियानों की शुरुआत, शस्त्र पूजन और शक्ति प्रदर्शन से भी जोड़कर देखा जाता था। ऐसे में दशहरे पर अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करना राजपरिवार की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। समय बदलने और राजशाही व्यवस्था समाप्त होने के बाद भी इस परंपरा का सांस्कृतिक महत्व बना हुआ है। वर्तमान दौर में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके पुत्र महानआर्यमन सिंधिया पारंपरिक शाही परिधान में इस विरासत से जुड़े आयोजन में शामिल होते रहे हैं। इस तरह यह आयोजन ग्वालियर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना हुआ है।
क्यों की जाती है शमी वृक्ष की पूजा?
शमी पूजन के पीछे धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हैं। विजयादशमी पर शमी वृक्ष की पूजा को शुभ माना जाता है। ग्वालियर की शाही दशहरा परंपरा में भी इसका विशेष स्थान है। पहली मान्यता महाभारत से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे। अज्ञातवास पूरा होने पर उन्होंने शस्त्र वापस प्राप्त किए और आगे चलकर विजय हासिल की। इसी कथा के आधार पर शमी वृक्ष को शस्त्रों की रक्षा और विजय का प्रतीक माना जाता है।
दूसरी मान्यता सोने की पत्तियों से जुड़ी है। धार्मिक परंपरा में शमी की पत्तियों को सोने का प्रतीक मानकर बांटने की प्रथा प्रचलित है। इसे भगवान राम की लंका विजय और अयोध्या लौटने के बाद धन बांटने से जुड़ी लोकमान्यताओं के संदर्भ में भी देखा जाता है। इसी वजह से शमी की पत्तियों को ‘सोना पत्ती’ कहा जाता है और विजयादशमी पर इन्हें एक-दूसरे को भेंट करना शुभ माना जाता है। इन मान्यताओं के चलते शमी पूजन को विजय, समृद्धि और शुभ शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
तलवार के स्पर्श के बाद शुरू होती है ‘सोने की लूट’
ग्वालियर के शाही दशहरे में सबसे आकर्षक पल वह होता है, जब शमी पूजन के बाद राजपरिवार के मुखिया अपनी पारंपरिक तलवार से शमी वृक्ष की डाल को स्पर्श करते हैं। यह रस्म पूरी होने के बाद वहां मौजूद लोगों के बीच पत्तियां लेने की होड़ लग जाती है। इसे स्थानीय परंपरा में ‘सोने की लूट’ कहा जाता है। हालांकि यहां वास्तविक सोना नहीं बल्कि शमी वृक्ष की पत्तियां एकत्र की जाती हैं। इन्हें सोने का प्रतीक मानकर लोग अपने साथ ले जाते हैं और शुभकामनाओं के साथ दूसरों को देते हैं।

यह रस्म केवल पत्तियां लेने तक सीमित नहीं है। इससे जुड़ी मान्यता लोगों को आपस में शुभकामनाएं बांटने और सुख-समृद्धि की कामना करने का अवसर देती है। इस दौरान धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक परंपरा और सामूहिक उत्साह का अनूठा दृश्य देखने को मिलता है।
1885 से पहले गोरखी के देवघर में होता था आयोजन
ग्वालियर में शाही दशहरे के आयोजन का स्थान भी समय के साथ बदला है। ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, महाराजा जयाजीराव सिंधिया के समय दशहरा उत्सव और शमी पूजन 1885 से पहले गोरखी स्थित देवघर में आयोजित किया जाता था। बाद में मांढरे की माता मंदिर की स्थापना के बाद इस परंपरा के आयोजन स्थल में बदलाव आया। उपलब्ध विवरण के मुताबिक वर्ष 1919 के बाद महाराजा माधवराव सिंधिया के समय से दशहरा उत्सव मांढरे की माता के यहां मनाया जाने लगा। इसके बाद से यह परंपरा वहीं निभाई जाती रही है। इस बदलाव के बावजूद गोरखी स्थित देवघर का महत्व समाप्त नहीं हुआ। दशहरे के दिन कुलदेवता और ऐतिहासिक शस्त्रों की पूजा की परंपरा आज भी इस आयोजन से जुड़ी हुई है। इस प्रकार गोरखी और मांढरे की माता, दोनों स्थान शाही दशहरे की परंपरा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इतिहासविद् इंद्रदेव सिंह ने बताया परंपरा का महत्व
इतिहासविद् इंद्रदेव सिंह के मुताबिक सिंधिया परिवार की सदियों पुरानी परंपराएं आज भी विशेष महत्व रखती हैं। पहले दशहरा उत्सव और शमी पूजन गोरखी स्थित देवघर में किया जाता था। उनके अनुसार, 1919 के बाद महाराजा माधवराव सिंधिया के समय से यह उत्सव मांढरे की माता के यहां मनाया जाने लगा। इंद्रदेव सिंह का कहना है कि यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और गरिमा के साथ निभाई जा रही है। उनके अनुसार, आयोजन का महत्व केवल धार्मिक रस्मों तक सीमित नहीं है बल्कि यह ग्वालियर के इतिहास, राजपरिवार की विरासत और स्थानीय जनआस्था से भी जुड़ा है।
मराठा विरासत और जनआस्था का संगम है ग्वालियर का दशहरा
ग्वालियर का शाही दशहरा अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण अलग पहचान रखता है। यहां कुलदेवता और ऐतिहासिक शस्त्रों की पूजा से लेकर शमी वृक्ष की पत्तियां बांटने तक, हर रस्म के साथ धार्मिक मान्यताएं और ऐतिहासिक संदर्भ जुड़े हैं। तलवार से शमी वृक्ष को स्पर्श करने और फिर पत्तियों को ‘सोना’ मानकर बांटने की परंपरा इस आयोजन को खास बनाती है। करीब 300 से 400 साल पुरानी बताई जाने वाली यह विरासत पीढ़ियों से चली आ रही है। आज भी यह ग्वालियर की सांस्कृतिक पहचान और मराठा परंपरा की याद दिलाती है।




















