PU Special :ग्वालियर के दशहरे में दिखती थी सिंधिया सेना की ताकत, घुड़सवारों से तोपखाने तक होता था प्रदर्शन

ग्वालियर रियासत में दशहरे पर सिंधिया सेना का सैन्य जुलूस निकलता था। जयविलास पैलेस पर गार्ड ऑफ ऑनर, महाराज बाड़े पर सलामी और सिंधिया एंथम बजाने की परंपरा का अनूठा है इतिहास।
ग्वालियर के दशहरे में दिखती थी सिंधिया सेना की ताकत, घुड़सवारों से तोपखाने तक होता था प्रदर्शन
दशहरे में दिखती थी सिंधिया सेना की ताकत

अर्पण राऊत, ग्वालियर। विजयादशमी पर शस्त्र पूजन की परंपरा के साथ ग्वालियर रियासत के शाही सैन्य समारोहों का इतिहास भी खास रहा है। सिंधिया शासनकाल में दशहरे के अवसर पर सेना की अलग-अलग टुकड़ियां राजकीय आयोजन में शामिल होती थीं। जयविलास पैलेस के प्रवेश द्वार पर महाराज को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता था, महाराज बाड़े पर सैन्य सलामी होती थी और शहर में घुड़सवार सैनिकों का जुलूस निकलता था। इस दौरान सिंधिया एंथम का वादन भी किया जाता था। रियासत के समाचार पत्र जयाजी प्रताप में दर्ज विवरण के मुताबिक इन आयोजनों में ग्वालियर सेना की तीसरी और दूसरी इन्फैंट्री, दूसरी ग्वालियर लांसर्स, कैवेलरी की विभिन्न टुकड़ियां और बी-बैटरी शामिल होती थीं। 

जयविलास पैलेस पर तीसरी इन्फैंट्री देती थी गार्ड ऑफ ऑनर

जयाजी प्रताप में प्रकाशित विवरण के अनुसार, विजयादशमी पर ग्वालियर सेना की तीसरी इन्फैंट्री जयविलास पैलेस के प्रवेश द्वार पर सिंधिया महाराज को गार्ड ऑफ ऑनर देती थी। इस बटालियन का नेतृत्व कर्नल गणपतराव निंबालकर करते थे। ऐतिहासिक विवरण में इस बटालियन की प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पूर्वी अफ्रीका में तैनाती का भी उल्लेख मिलता है। इससे तत्कालीन ग्वालियर सेना की गतिविधियों और रियासत की सैन्य इकाइयों की भूमिका का पता चलता है। जयविलास पैलेस पर गार्ड ऑफ ऑनर देना शाही समारोह का महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसमें सैन्य अनुशासन, औपचारिक सम्मान और राजकीय परंपरा का प्रदर्शन होता था।

महाराज बाड़े पर दूसरी इन्फैंट्री की सलामी, बजता था सिंधिया एंथम

दशहरे के आयोजन में ग्वालियर सेना की दूसरी इन्फैंट्री भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। उपलब्ध विवरण के मुताबिक यह टुकड़ी महाराज बाड़े पर सिंधिया महाराज को सैन्य सलामी देती थी। इसी अवसर पर सिंधिया एंथम का वादन किया जाता था। महाराज के साथ दूसरी ग्वालियर लांसर्स की टुकड़ी भी रहती थी। इस तरह समारोह में पैदल सैनिकों के साथ घुड़सवार सैन्य इकाइयों की भागीदारी भी दिखाई देती थी। जयविलास पैलेस पर गार्ड ऑफ ऑनर और महाराज बाड़े पर सलामी, दोनों आयोजन शाही दशहरे के औपचारिक और सैन्य स्वरूप को दर्शाते थे। इन आयोजनों के जरिए रियासत की सैन्य व्यवस्था और राजकीय परंपराओं का सार्वजनिक प्रदर्शन होता था।

सैन्य जुलूस में कैवेलरी, दूसरी ग्वालियर लांसर्स और बी-बैटरी

ग्वालियर रियासत के दशहरा समारोह में केवल पैदल सैनिक ही शामिल नहीं होते थे। सैन्य जुलूस में कैवेलरी सेकंड रेजिमेंट सिलेदार, बी-बैटरी, दूसरी ग्वालियर लांसर्स और अन्य सैन्य टुकड़ियां भी भाग लेती थीं। घुड़सवार सैनिकों की भागीदारी इस जुलूस को खास बनाती थी। विभिन्न सैन्य इकाइयों की मौजूदगी से यह आयोजन धार्मिक उत्सव के साथ-साथ सैन्य अनुशासन और शक्ति प्रदर्शन का अवसर भी बन जाता था। रियासत की सेना में अलग-अलग सैन्य शाखाएं थीं। इनमें इन्फैंट्री यानी पैदल सैनिक, कैवेलरी यानी घुड़सवार सैनिक और आर्टिलरी यानी तोपखाना शामिल थे। लांसर्स की टुकड़ियां भी सैन्य व्यवस्था का हिस्सा थीं। दशहरे के आयोजन में इन इकाइयों की भागीदारी ग्वालियर की तत्कालीन सेना की संरचना को समझने का अवसर देती है।

क्या होती थीं इन्फैंट्री, कैवेलरी और आर्टिलरी?

ग्वालियर रियासत की सेना में शामिल सैन्य शाखाओं की जिम्मेदारियां अलग-अलग थीं।

  • इन्फैंट्री: पैदल सैनिकों की टुकड़ी, जो जमीन पर पैदल रहकर सैन्य अभियान चलाती थी।
  • कैवेलरी: घुड़सवार सैनिकों की टुकड़ी, जिसका इस्तेमाल ऐतिहासिक रूप से तेजी से आवाजाही, निगरानी और सैन्य अभियानों में किया जाता था।
  • आर्टिलरी: तोपखाने से जुड़ी सैन्य शाखा, जो युद्ध में भारी हथियारों और तोपों के संचालन की जिम्मेदारी संभालती थी।
  • लांसर्स: पारंपरिक रूप से भाले से लैस घुड़सवार सैनिकों की टुकड़ियां, जो कई ऐतिहासिक सेनाओं का हिस्सा रही हैं। दशहरे के सैन्य समारोह में इन अलग-अलग इकाइयों की मौजूदगी से ग्वालियर रियासत की सेना की विविध संरचना सामने आती थी। यह आयोजन तत्कालीन सैन्य संगठन और उसकी औपचारिक परंपराओं का भी परिचायक था।

प्रथम विश्व युद्ध में पूर्वी अफ्रीका तक पहुंची थी ग्वालियर सेना की बटालियन

जयाजी प्रताप में दर्ज विवरण में तीसरी इन्फैंट्री की प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पूर्वी अफ्रीका में तैनाती का उल्लेख किया गया है। यह संदर्भ बताता है कि ग्वालियर रियासत की कुछ सैन्य इकाइयां केवल स्थानीय राजकीय आयोजनों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि व्यापक सैन्य गतिविधियों से भी जुड़ी रही थीं। कर्नल गणपतराव निंबालकर के नेतृत्व वाली तीसरी इन्फैंट्री का दशहरे पर जयविलास पैलेस में गार्ड ऑफ ऑनर देना उसके औपचारिक सैन्य दायित्वों का हिस्सा था। हालांकि बटालियन की तैनाती और युद्ध में उसकी भूमिका से जुड़े विस्तृत तथ्यों के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक अभिलेखों का अध्ययन जरूरी है।

जयविलास पैलेस में शाही डिनर नाइट : सिंधिया परिवार ने परोसी ‘शाही थाली’, मेहमानों ने महसूस की MP की विरासत

रियासतकालीन सैन्य परंपराओं की भारतीय सेना से समानता

स्वतंत्रता के बाद भारतीय रियासतों के एकीकरण के साथ उनकी सैन्य इकाइयों का भी पुनर्गठन हुआ। ग्वालियर की सेना से जुड़ी इकाइयों का इतिहास भारतीय सेना की कुछ इकाइयों की परंपराओं से संबंधित है। हालांकि आज की भारतीय सेना की संरचना विभिन्न ऐतिहासिक सैन्य परंपराओं और इकाइयों के योगदान से विकसित हुई है।

सिंधिया रिसर्च सेंटर, ग्वालियर के प्रमुख और इतिहासविद् अरुणांश गोस्वामी के मुताबिक, भारतीय सेना की कई परंपराओं और व्यवस्थाओं में सिंधिया राजवंश की सेना से समानता दिखाई देती है। उनका कहना है कि सेना के कई फॉर्मेट में सिंधिया सेना की परंपराओं का प्रभाव रहा है और यह आज भी ग्वालियर के लिए गर्व का विषय है।

Dr. Sumit  Shrivastava
By Dr. Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...

Latest Posts