जर्मन शिक्षिका फर्जी तरीके से 16 साल तक पेड सिक लीव पर रही, बिना ड्यूटी लिया 2.6 करोड़ रुपए से ज्यादा वेतन, मेडिकल दस्तावेजों में हेराफेरी की

बर्लिन। जर्मनी में 62 साल की एक शिक्षिका पर धोखाधड़ी और जालसाजी का आरोप लगा है। बताया जा रहा है कि वह 16 साल तक पेड सिक लीव पर रहीं और कभी क्लासरूम में वापस नहीं लौटीं। इस मामले ने सरकारी कर्मचारियों की लंबी बीमारी छुट्टियों की निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जर्मनी के सार्वजनिक प्रसारक टैगेशौ ने डुइसबर्ग के सरकारी अभियोजक कार्यालय के हवाले से बताया है कि शिक्षिका पर धोखाधड़ी के 11 गंभीर मामलों और दो दस्तावेजों में जालसाजी का आरोप है।
क्षेत्रीय अदालत में पहुंचा केस
जांचकर्ताओं का आरोप है कि काम करने में सक्षम होने के बावजूद उन्होंने वेतन के तौर पर 248,000 यूरो (2 करोड़ 63 लाख 92 हजार 656 रुपए) से अधिक की रकम ली। ये आरोप डुइसबर्ग की क्षेत्रीय अदालत में दायर किए गए हैं। महिला की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। वह जर्मनी के नॉर्थ राइन-वेस्टफेलिया क्षेत्र के वेसेल शहर के एक वोकेशनल कॉलेज में कार्यरत थीं। बताया जाता है कि उन्होंने फरवरी 2009 में पढ़ाना बंद कर दिया था, लेकिन सरकारी कर्मचारी के तौर पर उन्हें पूरा वेतन मिलता रहा। अपनी अनुपस्थिति को सही ठहराने के लिए वह लगातार मेडिकल सर्टिफिकेट जमा करती रहीं। यह मामला 2025 में तब चर्चा में आया जब अधिकारियों ने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या वह वास्तव में स्वास्थ्य कारणों से पढ़ाने में असमर्थ थीं। इसके बाद हुई आपराधिक जांच में नए आरोप सामने आए हैं। उनमें टीचर की स्कूबा-डाइविंग गतिविधियों से जुड़े मेडिकल दस्तावेजों में हेराफेरी भी शामिल है।
काम से दूरी का मामला जांच में कैसे आया
यह मामला तब उजागर हुआ जब शिक्षा अधिकारियों ने शिक्षिका की पर्सनल फाइल की समीक्षा की और सवाल उठाया कि बिना किसी औपचारिक मेडिकल जांच के वह इतने साल तक ड्यूटी से दूर कैसे रहीं। पिछली जांच रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल के एक नए प्रशासक ने कई साल तक लगातार वेतन दिए जाने के बाद इस व्यवस्था की जांच शुरू की। शिक्षिका ने मेडिकल जांच के आदेश को चुनौती दी और दलील दी कि इतने लंबे समय तक बीमारी प्रमाणित रहने के बाद अब ऐसी मांग करना अनुचित है। पिछली रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने उनकी चुनौती खारिज कर दी और उन्हें कानूनी खर्च के तौर पर 2,500 यूरो (2,66,035 रुपए) भुगतान करने का आदेश दिया।इस विवाद ने यह सवाल भी खड़ा किया कि आधिकारिक मेडिकल जांच का आदेश बहुत पहले क्यों नहीं दिया गया।
जर्मनी में यह है टीचर्स के लिए नियम
जर्मनी में सिविल सेवा प्रणाली के तहत, शिक्षक ड्यूटी के लिए चिकित्सकीय रूप से अयोग्य होने पर भी पूरा वेतन पा सकते हैं। यह निजी क्षेत्र के कई कर्मचारियों से अलग है, जिनके लिए बीमारी से जुड़े लाभों की एक निश्चित समय-सीमा होती है।हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सिविल सेवक मेडिकल जांच या अनुशासनात्मक कार्रवाई से बच सकते हैं। अधिकारी यह जांच कर सकते हैं कि कोई कर्मचारी काम करने के लिए फिट है या नहीं, और क्या मेडिकल आधार पर उसे रिटायर करना जरूरी है।




















