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Gen-Z के दो बड़े आंदोलन, दो अलग तस्वीरें!रांची में सड़कों पर हजारों युवा, जानिए दिल्ली के NEET प्रदर्शन से कैसे अलग है पूरा मामला 

Gen-Z के दो बड़े छात्र आंदोलन इसमय चर्चा में हैं- दिल्ली का NEET प्रदर्शन और झारखंड के रांची में चल रहा JPSC-JSSC आंदोलन।
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रांची में सड़कों पर हजारों युवा, जानिए दिल्ली के NEET प्रदर्शन से कैसे अलग है पूरा मामला 
Gen-Z के दो बड़े आंदोलन

रांची से दिल्ली तक युवाओं की आवाज एक जैसी दिखती है, लेकिन दोनों आंदोलनों की कहानी, मांग और तरीका काफी अलग है। एक तरफ दिल्ली में NEET परीक्षा से जुड़े सवालों को लेकर छात्रों ने जंतर-मंतर पर आवाज उठाई, तो दूसरी तरफ झारखंड की राजधानी रांची में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ हजारों युवा सड़कों पर हैं।

दोनों आंदोलनों में युवाओं और Gen-Z की बड़ी भागीदारी है। दोनों के पीछे परीक्षा और भविष्य से जुड़ी चिंता है। लेकिन अगर गहराई से देखें तो दिल्ली का आंदोलन राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था पर सवालों से जुड़ा था, जबकि रांची का आंदोलन राज्य की सरकारी भर्ती व्यवस्था में बदलाव और पारदर्शिता की मांग पर केंद्रित है।

रांची में 10 अगस्त को छात्रों के विधानसभा मार्च के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हुई। बैरिकेड पार करने की कोशिश के बाद पुलिस ने वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों, दोनों पक्षों के घायल होने की खबरें सामने आईं। अब सवाल है- दिल्ली और रांची के छात्र आंदोलनों में आखिर इतना अंतर क्यों है?

पहले समझिए रांची में आंदोलन क्यों हो रहा है?

झारखंड में JPSC यानी झारखंड लोक सेवा आयोग और JSSC यानी झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की भर्ती परीक्षाओं को लेकर अभ्यर्थी लंबे समय से सवाल उठा रहे हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, देरी और दूसरी अनियमितताओं ने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। छात्रों की मांग है कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर कार्रवाई हो और भर्ती प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाया जाए। हालिया रिपोर्टों में आंदोलन को भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और कथित परीक्षा अनियमितताओं से जोड़कर बताया गया है।

रांची का आंदोलन 25 जुलाई से शुरू हुआ और 10 अगस्त को विधानसभा मार्च के बाद इसका दायरा और बढ़ गया। छात्रों के लिए यह सिर्फ एक परीक्षा का सवाल नहीं है। सरकारी नौकरी की तैयारी में युवा कई साल लगा देते हैं। परिवार पैसा खर्च करता है और छात्र अपना समय और ऊर्जा लगाते हैं। ऐसे में अगर परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो उनके भविष्य को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।

दिल्ली में NEET आंदोलन की कहानी क्या थी?

दिल्ली में छात्रों का प्रदर्शन NEET परीक्षा को लेकर हुआ। जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में छात्रों और समर्थकों ने परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मुद्दे को उठाया। दिल्ली का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन गया क्योंकि NEET सिर्फ किसी एक राज्य की परीक्षा नहीं है। इसमें देशभर के छात्र शामिल होते हैं और मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश का भविष्य इसी परीक्षा से जुड़ा होता है।
जंतर-मंतर पर आंदोलन के दौरान छात्रों ने परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और अपने भविष्य को लेकर सवाल उठाए। आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिला और यह राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना। यानी दिल्ली का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा और मेडिकल प्रवेश व्यवस्था से जुड़ा था, जबकि रांची में मुद्दा झारखंड की सरकारी भर्ती परीक्षाओं का है।

सबसे बड़ा फर्क- मुद्दा राष्ट्रीय या राज्य स्तर का?

यही दोनों आंदोलनों के बीच पहला बड़ा अंतर है।

दिल्ली का NEET आंदोलन- दिल्ली में मुद्दा पूरे देश के मेडिकल अभ्यर्थियों से जुड़ा था। NEET में देशभर के छात्र शामिल होते हैं। इसलिए परीक्षा को लेकर उठे सवालों का असर राष्ट्रीय स्तर पर महसूस हुआ।

रांची का JPSC-JSSC आंदोलन- रांची में आंदोलन मुख्य रूप से झारखंड की सरकारी भर्ती व्यवस्था से जुड़ा है। JPSC और JSSC के जरिए राज्य में अलग-अलग सरकारी पदों के लिए भर्ती होती है।

मांगों में क्या अंतर है?

दोनों आंदोलनों में परीक्षा व्यवस्था को लेकर नाराजगी है, लेकिन मांगों का फोकस अलग है। दिल्ली में छात्रों का मुख्य सवाल थ NEET की परीक्षा प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष है और कथित पेपर लीक या अनियमितताओं की जांच कैसे होगी? वहीं रांची में छात्र भर्ती प्रक्रिया में व्यापक सुधार की मांग कर रहे हैं। रांची के प्रदर्शनकारी परीक्षा रद्द करने, कथित अनियमितताओं की जांच, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और व्यवस्था में सुधार जैसी मांगें उठा रहे हैं।

दोनों जगह Gen-Z, लेकिन आंदोलन का अंदाज अलग

दोनों आंदोलनों में युवा बड़ी संख्या में शामिल हैं। लेकिन रांची की तस्वीर कई मायनों में अलग दिखाई देती है। रांची में छात्रों ने धरना, मार्च, नारेबाजी और विधानसभा घेराव जैसे पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया। यहां सोशल मीडिया के साथ-साथ सड़क पर मौजूदगी आंदोलन की बड़ी ताकत बनी। वहीं दिल्ली के आंदोलन में जंतर-मंतर जैसे राष्ट्रीय प्रदर्शन स्थल के कारण मीडिया और सोशल मीडिया दोनों पर काफी ध्यान गया। रांची में एक प्रदर्शनकारी का Spider-Man मास्क पहनकर पहुंचना भी चर्चा में रहा। इस तरह के प्रतीक दिखाते हैं कि Gen-Z अपनी पारंपरिक मांगों के साथ नए तरीके और सोशल मीडिया संस्कृति को भी आंदोलन में जोड़ रहा है।

दिल्ली में राजनीतिक रंग ज्यादा दिखा, रांची में व्यवस्था पर जोर?

दोनों आंदोलनों में राजनीति का असर पूरी तरह अलग नहीं रहा। लेकिन उनके सार्वजनिक संदेश में अंतर जरूर दिखाई देता है। दिल्ली में NEET विवाद के दौरान सरकार और शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही पर राजनीतिक बहस तेज हुई। अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं ने छात्रों के पक्ष में बयान दिए। रांची में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, लेकिन छात्रों की मुख्य मांग भर्ती व्यवस्था में बदलाव के आसपास बनी हुई है। इसलिए रांची आंदोलन को सिर्फ सरकार विरोधी आंदोलन के रूप में देखना अधूरा होगा। इसका बड़ा हिस्सा भर्ती व्यवस्था में भरोसा वापस लाने की मांग से जुड़ा है।

आंदोलन के तरीके में भी बड़ा अंतर

दिल्ली में क्या हुआ? दिल्ली का प्रदर्शन जंतर-मंतर पर केंद्रित रहा। वहां धरना, भाषण, नारे और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आंदोलन का हिस्सा बने। प्रदर्शन को राष्ट्रीय मीडिया कवरेज मिली। दिल्ली में पुलिस कार्रवाई को लेकर भी विवाद सामने आया और इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कथित पुलिस ज्यादती से जुड़ी याचिकाओं पर सरकार से जवाब मांगा था।

रांची में क्या हुआ? रांची में छात्रों ने विधानसभा की ओर मार्च किया। पुलिस ने रास्ते में बैरिकेडिंग की। जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड पार करने की कोशिश की तो पुलिस ने वाटर कैनन और बल प्रयोग किया। यानी दिल्ली में आंदोलन का प्रमुख केंद्र जंतर-मंतर था, जबकि रांची में आंदोलन ने सीधे विधानसभा तक पहुंचने की कोशिश की।

रांची में पुलिस कार्रवाई के बाद क्यों बढ़ा तनाव?

10 अगस्त का दिन रांची आंदोलन के लिए अहम रहा। हजारों छात्र विधानसभा की ओर बढ़े। पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। स्थिति बिगड़ने के बाद आंसू गैस, वाटर कैनन और लाठीचार्ज की कार्रवाई हुई। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों पक्षों के कुछ लोग घायल हुए।

क्या दोनों आंदोलनों के पीछे एक ही गुस्सा है?

काफी हद तक हां। दोनों जगह युवाओं की मूल चिंता है- मेहनत के बाद भी अगर परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहेगा तो भविष्य का क्या होगा? प्रतियोगी परीक्षा देने वाला छात्र केवल परीक्षा हॉल में नहीं लड़ता। वह कई साल तैयारी करता है। परिवार आर्थिक और भावनात्मक रूप से उसके साथ खड़ा रहता है। इसलिए पेपर लीक, कथित गड़बड़ी, परीक्षा रद्द होने या भर्ती में देरी की खबरें युवाओं के लिए सिर्फ प्रशासनिक समस्या नहीं होतीं। यह उनके करियर और परिवार की उम्मीदों से जुड़ा मामला बन जाता है।

Garima Vishwakarma
By Garima Vishwakarma

गरिमा विश्वकर्मा | People’s Institute of Media Studies से B.Sc. Electronic Media की डिग्री | पत्रकार...Read More

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