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नरेश भगोरिया, भोपाल। प्रदेश की राजनीति और फिर देश के बड़े नेता रहे सुंदरलाल पटवा की 11 नवंबर को जयंती है। प्रदेशभर में भाजपा अपने प्रिय नेता को याद कर रही है। मप्र विधानसभा में डॉ. मोहन यादव ने भी पूर्व मुख्यमंत्री की तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर याद किया। प्रदेश की राजनीति में हमेशा छाए रहे पटवा चुनाव लड़ने से बचना चाहते थे। उनका पहले चुनाव भी वे बायचांस लड़े। उनके पहले चुनाव का भी बहुत रोचक किस्सा है। पटवा खुद बताया करते थे कि वे राजनीति में धोखे से लाए गए, उनका मन नहीं था। दरअसल जनसंघ के दौर में पार्टी को अच्छे नेताओं की जरूरत थी और पटवा उन्हीं में से एक थे। आगे चलकर उन्होंने पार्टी का नेतृत्व किया, मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में भी मंत्री की जिम्मेदारी भी निभाई।
बात उस दौर की है जब सुंदरलाल पटवा मंदसौर जिले की मनासा तहसील में जनसंघ के अध्यक्ष हुआ करते थे। सन 1956 में एक दिन कुशाभाऊ ठाकरे मंदसौर जिले के दौरे पर थे। वे एक दिन सुंदरलाल पटवा के घर पहुंचे और 1957 में मनासा से चुनाव लड़ने को कहा। इतना सुनते ही पटवा ने हाथ जोड़ लिए और चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। पटवा ने कहा कि वे पारिवारिक कारणों से चुनाव लड़ने में असमर्थ हैं। कुशाभाऊ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अन्य नेताओं से भी पटवा पर दबाव डलवाया लेकिन पटवा नहीं मानें। जब चुनाव आए तो मनास से रामचंद्र बसेर को प्रत्याशी बनाया गया।
जब चुनाव में नामांकन की तिथि करीब आई तो रामचंद्र बसेर के साथ पटवा खुशी-खुशी नामांकन भरवाने रिटर्निंग ऑफिसर के कार्यालय गए। वहीं तय किया गया कि पटवा को डमी कैंडिडेट के रूप में फॉर्म जमा करना है। नामांकन पत्रों की जांच हुई, बसेर का फॉर्म सही रहा तो पटवा उसी दिन अपना नाम वापस लेना चाहते थे, लेकिन उन्हें यह कहकर रोक दिया गया कि इतनी जल्दी क्या है, अभी तो बहुत समय है। लेकिन तभी किसी बड़े नेता के कहने पर रामचंद्र बसेर ने नामांकन फॉर्म उठा लिया। इस पर पटवा भड़क गए और कह दिया हरगिज चुनाव नहीं लड़ूंगा। पटवा के घर पर भी विरोध हुआ। उनके पिता भी नहीं चाहते थे कि पटवा चुनाव लड़ें।
ऐसी स्थित में जनसंघ के नेता पटवा के घर पहुंचे। तब पटवा से कहा गया कि क्या आप चाहते हैं कि जनसंघ का कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं हो और कांग्रेस आसानी से जीत जाए। तब जाकर पटवा चुनाव लड़ने को तैयार हुए। वे चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने। दरअसल चुनाव लड़कार कुशाभाऊ राजनीति में सक्रिय करना चाहते थे। हुआ भी यही, पटवा प्रदेश की राजनीति में ऐसे सक्रिय हुए कि हर कोई उनकी कार्यशैली का लोहा मानता था।