E20 के बाद अब जहाजों के फ्यूल की बारी! समुद्री जहाजों में 10% बायोफ्यूल का प्रस्ताव, जानें क्या बदलेगा

देश में E20 पेट्रोल को लेकर बहस चल रही है। पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा, माइलेज और इंजन पर इसके असर को लेकर लोग सवाल उठा रहे हैं। इसी बीच सरकार ने समुद्री जहाजों में इस्तेमाल होने वाले फ्यूल को लेकर भी बड़ा कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। सरकार ने जहाजों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए मरीन फ्यूल में बायोफ्यूल मिलाने का ड्राफ्ट रोडमैप जारी किया है।
क्या है सरकार का प्लान?
सरकार का मकसद समुद्र में चलने वाले जहाजों को धीरे-धीरे ज्यादा साफ और कम कार्बन वाले फ्यूल की तरफ ले जाना है। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ मरीन एडमिनिस्ट्रेशन यानी DGMA के ड्राफ्ट के मुताबिक, पारंपरिक मरीन फ्यूल में बायोफ्यूल मिलाने से जहाजों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों को कम किया जा सकता है। खास बात यह है कि बायोफ्यूल ब्लेंड का इस्तेमाल करने के लिए मौजूदा जहाजों में बड़े तकनीकी बदलाव की जरूरत नहीं पड़ सकती।
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10% बायोफ्यूल ब्लेंड का प्रस्ताव
DGMA ने समुद्री जहाजों के फ्यूल में 10% बायोफ्यूल ब्लेंड का प्रस्ताव रखा है। आसान भाषा में समझें तो 100 हिस्से मरीन फ्यूल में कम से कम 10 हिस्से बायोफ्यूल के रखने की योजना है। इसका मकसद पारंपरिक फ्यूल पर निर्भरता कम करना और प्रदूषण घटाना है। हालांकि, इस्तेमाल फ्यूल की उपलब्धता, जहाज के इंजन की क्षमता, सुरक्षा, फ्यूल की गुणवत्ता और निर्माता की सलाह जैसी चीजों पर भी निर्भर करेगा।
2028 से शुरू होगा बदलाव
ड्राफ्ट के मुताबिक, 1 जनवरी 2028 से इंडियन कोस्टल ट्रेड में चलने वाले जहाजों को MGO, VLSFO या FO जैसे मरीन फ्यूल के साथ बायोफ्यूल ब्लेंड इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इस दौरान जहाज मालिकों और ऑपरेटरों को धीरे-धीरे नई व्यवस्था के लिए तैयार होना होगा। इसमें फ्यूल की खरीद, उसकी गुणवत्ता और इंजन के साथ कम्पैटिबिलिटी की जांच, स्टोरेज, क्रू की ट्रेनिंग और फ्यूल की खपत पर नजर रखने जैसी तैयारियां शामिल होंगी।
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2029 से 10% बायोफ्यूल जरूरी करने का प्रस्ताव
DGMA के रोडमैप में 1 जनवरी 2029 से एक और बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। इसके तहत इंडियन कोस्टल ट्रेड में आने वाले जहाजों के प्रोपल्शन और दूसरी मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले मरीन फ्यूल में कम से कम 10% बायोफ्यूल रखना जरूरी होगा। यानी 2028 में जहां इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, वहीं 2029 से यह व्यवस्था अनिवार्य करने का प्रस्ताव है।
कौन-कौन से जहाज और फ्यूल आएंगे दायरे में?
प्रस्तावित नियम उन जहाजों पर लागू होंगे जो MGO, VLSFO और FO जैसे पारंपरिक मरीन फ्यूल का इस्तेमाल करते हैं। इसमें जहाज को चलाने वाले इंजन के साथ दूसरी जरूरी मशीनरी में इस्तेमाल होने वाला मरीन फ्यूल भी शामिल है। फिलहाल प्रस्ताव का दायरा इंडियन कोस्टल ट्रेड में चलने वाले जहाजों तक बताया गया है।
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सिर्फ जहाज मालिकों की जिम्मेदारी नहीं
बायोफ्यूल ब्लेंडिंग की इस पूरी व्यवस्था में सिर्फ जहाज मालिक ही नहीं, बल्कि कई दूसरे पक्ष भी शामिल होंगे। इनमें शिप मैनेजर, ऑपरेटर, चार्टरर, जहाज के मास्टर, बंकर सप्लायर, फ्यूल बनाने वाली कंपनियां और ब्लेंडर शामिल हैं। यानी फ्यूल तैयार करने से लेकर उसे जहाज तक पहुंचाने और इस्तेमाल करने तक पूरी सप्लाई चेन को नए सिस्टम के लिए तैयार करना होगा।
बायोफ्यूल को लेकर क्या है सरकार की सोच?
सरकार का मानना है कि मौजूदा जहाजों को पूरी तरह नए फ्यूल सिस्टम में बदलने के बजाय धीरे-धीरे बायोफ्यूल ब्लेंड की तरफ ले जाना ज्यादा आसान और कम खर्चीला तरीका हो सकता है। अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो समुद्री परिवहन से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है। DGMA के मुताबिक, यह प्रस्ताव नेशनल मैरीटाइम डीकार्बोनाइजेशन पॉलिसी फ्रेमवर्क, नेशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स 2018 और भारत के पर्यावरणीय लक्ष्यों के अनुरूप है।



















