राज्योत्सव में बस्तर की ढोकरा कला का जलवा,लकड़ी और धातु में कलाकारों ने उतारी आदिवासी संस्कृति, झिटकू-मिटकी की प्रेमगाथा बनी आकर्षण

रायपुर: छत्तीसगढ़ राज्योत्सव में इस बार बस्तर की पारंपरिक ढोकरा कला लोगों के आकर्षण का बड़ा केंद्र बनी हुई है। कोण्डागांव जिले के ग्राम करणपुर से पहुंचे कलाकार अपनी अद्भुत कारीगरी से लकड़ी और धातु को ऐसी जीवंत कलाकृतियों में ढाल रहे हैं, जिनमें आदिवासी संस्कृति, लोकजीवन, परंपराएं और आस्था की झलक दिखाई देती है। झिटकू-मिटकी की प्रसिद्ध प्रेमगाथा से लेकर देवी-देवताओं की प्रतिमाओं तक, कलाकारों का हुनर देखने के लिए लोग स्टॉल पर पहुंच रहे हैं। राज्योत्सव इन शिल्पकारों के लिए अपनी कला प्रदर्शित करने के साथ रोजगार और बाजार से जुड़ने का भी बड़ा अवसर बन रहा है।
बस्तर की कला ने राज्योत्सव में जमाया रंग, हर कलाकृति में दिख रही संस्कृति की झलक
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान केवल लोकगीत, लोकनृत्य और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। यहां की पारंपरिक हस्तकलाएं भी प्रदेश की समृद्ध विरासत को देश-दुनिया तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाती हैं। इन्हीं में बस्तर की ढोकरा कला अपनी अलग पहचान रखती है। राज्योत्सव में ग्राम करणपुर, जिला कोण्डागांव से पहुंचे कलाकारों द्वारा तैयार की गई हस्तनिर्मित कलाकृतियां लोगों को खूब आकर्षित कर रही हैं। लकड़ी और धातु से तैयार इन कलाकृतियों में कलाकारों की रचनात्मकता के साथ बस्तर की सांस्कृतिक विरासत भी साफ नजर आती है।
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झिटकू-मिटकी की प्रेमगाथा से लेकर देवी प्रतिमाओं तक, अनोखी कलाकृतियां
स्टॉल पर प्रदर्शित कलाकृतियों में बस्तर की लोककथा और प्रेमगाथा से जुड़ी झिटकू-मिटकी की प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यह कलाकृति स्थानीय लोकआस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को दर्शाती है। इसके अलावा आदिवासी जीवनशैली, पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य, ग्रामीण परिवेश और देवी-देवताओं की आकर्षक प्रतिमाएं भी लोगों का ध्यान खींच रही हैं। हर कलाकृति में बस्तर के रहन-सहन, परंपराओं और लोकसंस्कृति को कलात्मक अंदाज में उकेरा गया है।
मशीनों को चुनौती दे रहा हाथों का हुनर, पीढ़ियों से संजोई है शिल्पकला
आधुनिक मशीनों से तैयार सजावटी वस्तुओं के बीच करणपुर के कलाकारों की हस्तनिर्मित कलाकृतियां अपनी मौलिकता के कारण अलग पहचान बना रही हैं। इन शिल्पकारों के लिए कला केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत है। बस्तर की ढोकरा कला में गढ़वा समुदाय के पारंपरिक शिल्पकारों का महत्वपूर्ण योगदान है। धातु को विशेष पारंपरिक तकनीक से आकार देकर आकर्षक आकृतियां तैयार की जाती हैं। मोम की ढलाई यानी लॉस्ट वैक्स तकनीक इस शिल्प की प्रमुख विशेषता है। कलाकृतियों की बारीक बनावट, पारंपरिक डिजाइन और विशिष्ट रूप इन्हें दूसरी सजावटी वस्तुओं से अलग बनाते हैं।
राज्योत्सव बना कलाकारों के लिए बाजार का बड़ा मंच, हुनर को मिल रही नई पहचान
ग्राम करणपुर से पहुंचे कलाकार राज्योत्सव में अपनी तैयार कलाकृतियों की प्रदर्शनी और बिक्री कर रहे हैं। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंच रहे लोग इन हस्तनिर्मित उत्पादों को करीब से देख रहे हैं और पसंद के अनुसार खरीदारी भी कर रहे हैं। राज्योत्सव कलाकारों के लिए केवल बिक्री का अवसर नहीं, बल्कि अपनी पारंपरिक कला को नए ग्राहकों और बड़े बाजार तक पहुंचाने का माध्यम भी बन रहा है। कलाकृतियों की बिक्री से उन्हें आर्थिक सहयोग मिलने के साथ अपने पारंपरिक हुनर को आगे बढ़ाने का प्रोत्साहन मिल रहा है।
परंपरा को रोजगार से जोड़ने की पहल, हस्तशिल्प को मिल रहा प्रोत्साहन
पारंपरिक हस्तकलाओं को बाजार उपलब्ध कराना स्थानीय कलाकारों की आर्थिक मजबूती के लिए महत्वपूर्ण है। राज्योत्सव जैसे आयोजन शिल्पकारों को सीधे लोगों से जुड़ने और अपने उत्पादों की पहचान बनाने का अवसर देते हैं। करणपुर के कलाकारों की यह पहल बताती है कि यदि पारंपरिक कला को सही मंच और बाजार मिले तो सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के साथ स्थानीय स्तर पर आजीविका के नए अवसर भी तैयार किए जा सकते हैं।




















