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जेंटल पेरेंटिंग हुई पुरानी, अब ऑथोरिटेटिव पेरेंटिंग का ट्रेंड! प्यार के साथ ऐसे तय करें बच्चों की सीमाएं..

आज के दौर में पेरेंटिंग का तरीका तेजी से बदल रहा है। Gentle Parenting के बाद Authoritative Parenting को लेकर चर्चा बढ़ी है। इस तरीके में बच्चों की भावनाओं को समझने और उनकी बात सुनने के साथ घर के जरूरी नियम भी तय किए जाते हैं। इसका मकसद सख्ती नहीं बल्कि प्यार, समझ और अनुशासन के बीच संतुलन बनाना है।
जेंटल पेरेंटिंग हुई पुरानी, अब ऑथोरिटेटिव पेरेंटिंग का ट्रेंड! प्यार के साथ ऐसे तय करें बच्चों की सीमाएं..
बच्चों की परवरिश का नया अंदाज

बच्चों की परवरिश आसान काम नहीं है। कभी बच्चा मोबाइल छोड़ने को तैयार नहीं होता, तो कभी खाने या सोने के समय अपनी जिद पर अड़ जाता है। ऐसे में माता-पिता के सामने सवाल होता है कि बच्चे को समझाया जाए या सख्ती दिखाई जाए। इसी बीच पेरेंटिंग की दुनिया में Gentle Parenting के बाद Authoritative Parenting की चर्चा हो रही है। इस तरीके में बच्चों को अपनी बात रखने की आजादी दी जाती है, लेकिन साथ ही उम्र और जरूरत के हिसाब से कुछ स्पष्ट नियम भी बनाए जाते हैं। यानी बच्चे की भावनाओं को समझते हुए उसे सीमाओं और जिम्मेदारियों की अहमियत भी सिखाई जाती है।

क्या है Authoritative Parenting?

Authoritative Parenting को आसान भाषा में समझें तो यह ऐसा तरीका है, जिसमें माता-पिता बच्चे के साथ अपनापन रखते हैं, उसकी बात सुनते हैं और उसकी भावनाओं को समझने की कोशिश करते हैं। इसके साथ ही घर में कुछ जरूरी नियम और सीमाएं भी तय की जाती हैं। यहां नियम बनाने का मकसद बच्चे को डराना नहीं, बल्कि उसे धीरे-धीरे जिम्मेदारी समझाना होता है।

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बच्चे की बात सुनना जरूरी

इस पेरेंटिंग स्टाइल में बच्चे की भावनाओं को महत्व दिया जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी हर मांग पूरी कर दी जाए। उदाहरण के लिए बच्चा बाजार में खिलौना देखकर उसे खरीदने की जिद करता है, तो माता-पिता उसकी इच्छा को समझ सकते हैं, लेकिन हर बार खिलौना खरीदना जरूरी नहीं है। बच्चे को प्यार से कारण बताकर मना किया जा सकता है। इससे वह धीरे-धीरे निराशा और सीमाओं को समझना सीखता है।

मोबाइल और कार्टून के लिए ऐसे बनाएं नियम

बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर घर में अक्सर परेशानी होती है। Authoritative Parenting में केवल यह कहना कि मोबाइल बंद करो, जरूरी नहीं माना जाता। माता-पिता बच्चे को बता सकते हैं कि ज्यादा स्क्रीन देखने से पढ़ाई, खेल और नींद का समय प्रभावित हो सकता है। इसके बाद उम्र के अनुसार स्क्रीन टाइम तय किया जा सकता है। सबसे जरूरी बात यह है कि नियम साफ हों और माता-पिता भी उन्हें लगातार लागू करें।

गलती होने पर डांट नहीं, जिम्मेदारी समझाएं

बच्चे से गलती होने पर उसे डराने या मारने के बजाय उसके व्यवहार का असर समझाना इस तरीके का अहम हिस्सा है। अगर बच्चा खेलते समय अपना सामान पूरे कमरे में फैला देता है, तो माता-पिता उसे खुद सामान समेटने के लिए कह सकते हैं। इससे बच्चे को यह समझने में मदद मिलती है कि उसके काम के साथ उसकी जिम्मेदारी भी जुड़ी है।

Gentle Parenting से कितना अलग है यह तरीका?

Gentle Parenting और Authoritative Parenting में कई बातें एक जैसी हैं। दोनों में बच्चे की भावनाओं, सम्मान और बेहतर संवाद को महत्व दिया जाता है। फर्क मुख्य रूप से सीमाओं और नियमों को लेकर दिखाई देता है। Authoritative Parenting में प्यार और समझ के साथ स्पष्ट नियम बनाए रखने पर खास जोर रहता है। इसलिए इसे न तो पूरी आजादी देना कहा जा सकता है और न ही कठोर अनुशासन।

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पेरेंटिंग का कोई एक फॉर्मूला नहीं

हर बच्चा अलग होता है और हर परिवार की परिस्थितियां भी अलग होती हैं। इसलिए किसी एक पेरेंटिंग स्टाइल को हर बच्चे पर बिल्कुल एक जैसे तरीके से लागू करना सही नहीं माना जा सकता। माता-पिता बच्चे की उम्र, स्वभाव और जरूरत के अनुसार अपने तरीके में बदलाव कर सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि बच्चे को सम्मान और सुरक्षा का एहसास मिले और साथ ही उसे जरूरी सीमाएं और जिम्मेदारियां समझने का मौका भी मिले।

Aditi Rawat
By Aditi Rawat

अदिति रावत | MCU, भोपाल से M.Sc.(न्यू मीडिया टेक्नॉलजी)| एंकर, न्यूज़ एक्ज़िक्यूटिव की जिम्मेदारियों...Read More

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