Aakash Waghmare
27 Jan 2026
अर्पण राऊत ’ वाराणसी। मृत्यु शब्द ही जेहन में सिहरन पैदा कर देता है। मृत्यु सबकी होती है, लेकिन मोक्ष के लिए यदि लोग एडवांस बुकिंग करते हैं और परिजन भी इसमें सहभागी होते है तो सुनकर अचरज जरूर होगा। लेकिन 68 सालों से ये परंपरा बनारस (काशी) में अनवरत जारी है। मृत्यु शैया पर पड़े मौत के इंतजार में यहां लोग मोक्ष के लिए ईश्वर का नाम लेकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं। इसकी फीस भी महज 20 रुपए प्रतिदिन है।
वाराणसी मे गुदौलिया चौराहे के नजदीक संकरी गली मे काशी लाभ मुक्ति भवन है। यह भवन उद्योगपति डालमिया परिवार का है। इस 118 साल पुराने घर में 68 साल से ये अनोखा आश्रम संचालित है। यहां ऐसे लोगों को लाया जाता है, जिनके जीवन का अंतिम समय होता है और डॉक्टर जवाब दे चुके हैं। पीपुल्स समाचार की टीम आश्रम पहुंची, तो यहां पता चला कि यहां नालंदा, बिहार से एक परिवार 85 साल की वृद्ध मां को लेकर आया है। वृद्धा के बेटे राकेश (परिवर्तित नाम) बताते हैं, मां के मोक्ष के लिए 26 दिनों से पत्नी व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आश्रम में ठहरे हुए हैं। यहां सभी को एक माह का समय दिया जाता है। इस अवधि में मृत्यु हो जाए, तो ठीक वरना वापस घर भेज दिया जाता है। यहां छोटी उम्र में कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रहे मरीज भी अंतिम समय में मोक्ष प्राप्ति के लिए आते हैं।
आश्रम के सेवादारों के अनुसार, 68 सालों में यहां 15 हजार से ज्यादा लोग मोक्ष पा चुके हैं। इनमें कुछ विदेशी भी हैं। हाल में बैंकॉक से एक व्यक्ति भी परिवार के साथ आया था। आश्रम में 10 कमरे हैं, जो अक्सर भरे रहते हैं। आश्रम का इंतजाम नई दिल्ली स्थित सिंधिया मार्ग से संचालित डालमिया ग्रुप करता है। यहां छह लोग सेवारत हैं। यहां पेमेंट केवल 20 रुपए है। इसमें भी कोई सक्षम नहीं है, तो संस्थान खर्च वहन करता है।
मान्यता के अनुसार, काशी (वाराणसी) को सनातन धर्म में मोक्ष का द्वार माना जाता है। कहते हैं कि महादेव स्वयं अंतिम समय में तारक मंत्र का उच्चारण करते हैं। मणिकर्णिका सहित अन्य घाटों पर शरीर त्यागने से आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करती है। यहां मृत्यु भी मंगलकारी मानी जाती है। मणिकर्णिका घाट पर रोजाना कम से कम 100 से ज्यादा चिताओं को दाग दिया जाता है।
मैं 16 साल से यहां सेवा दे रहा हूं। जीवन का उद्देश्य समझ आने के बाद जाना कि मानवता से बड़ा कुछ नहीं। जब यह अहसास हुआ, तो आश्रम में आकर काम करने लगा।
काली कांत दुबे, सेवादार