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Supreme Court News :महाकालेश्वर मंदिर में 'वीआईपी दर्शन' व्यवस्था में दखल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में 'वीआईपी दर्शन' की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार को हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि यह विषय न्यायिक निर्णय के दायरे में नहीं आता है।
महाकालेश्वर मंदिर में 'वीआईपी दर्शन' व्यवस्था में दखल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में 'वीआईपी दर्शन' की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर दखल देने से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने मंदिर में कथित 'वीआईपी' को गर्भगृह में जलाभिषेक की अनुमति और आम श्रद्धालुओं पर पाबंदी को लेकर उठाया था। मामले में हस्तक्षेप करने की सुप्रीम कोर्ट की अनिच्छा के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे पीठ ने स्वीकार कर लिया।

    गर्भगृह में प्रवेश के लिए एक जैसी नीति हो

    याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और गर्भगृह में प्रवेश के लिए एक समान नीति होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 'वीआईपी' दर्जे के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता और यदि कुछ लोगों को कलेक्टर जैसी प्राधिकृत सिफारिशों पर प्रवेश दिया जाता है, तो समान स्थिति वाले अन्य भक्तों को भी अधिकार मिलना चाहिए। पीठ ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया। चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति या प्रतिबंध का निर्णय अदालतों का विषय नहीं है और यह मंदिर प्रशासन के विवेक पर छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने टिप्पणी की कि अदालतें यदि यह तय करने लगें कि किसे प्रवेश मिले और किसे नहीं, तो यह अदालतों के लिए मुश्किल हो जाएगा।

    ...तो अन्य मौलिक अधिकारों के दावे उठेंगे

    चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि यदि गर्भगृह के भीतर अनुच्छेद 14 को लागू माना गया, तो अन्य मौलिक अधिकारों के दावे भी उठ सकते हैं, जिससे धार्मिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं जटिल हो जाएंगी। अधिवक्ता जैन ने दोहराया कि उनकी आपत्ति केवल भेदभाव तक सीमित है और या तो पूर्ण प्रतिबंध हो या सभी के लिए समान प्रवेश, लेकिन पीठ अपने रुख पर कायम रही। अंततः याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली।

    वीआईपी की भाषा कानून में निर्धारित नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति दी जाती है और वह सक्षम प्राधिकरण के समक्ष अपने सुझाव-अनुशंसाएं प्रस्तुत कर सकता है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के निष्कर्षों का भी संज्ञान लिया, जिसमें कहा गया था कि महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति की बैठकों के ब्यौरे में गर्भगृह में प्रवेश पर कोई विशिष्ट निषेध नहीं दर्शाया गया है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि 'वीआईपी' की परिभाषा किसी कानून या नियम में निर्धारित नहीं है और अनुमति सक्षम प्राधिकारी के विवेक पर, मामले-दर-मामले दी जाती है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से पीड़ित मानते हुए याचिका को 'सुनवाई के लिए स्वीकार नही' कहकर खारिज कर दिया था। 

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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