इंदौर रीगल पर अनशन : कड़ाके की ठंड में पेड़ों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे पर्यावरण प्रेमी

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 इंदौर रीगल पर अनशन : कड़ाके की ठंड में पेड़ों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे पर्यावरण प्रेमी
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    इंदौर।
    शहर में तेजी से खत्म होती हरियाली को बचाने के लिए गुरुवार देर रात से जाहिन्ट पार्टी के नेतृत्व में शहर के हृदय स्थल रीगल चौराहे पर आमरण अनशन शुरू कर दिया गया है। कड़ाके की ठंड के बावजूद पर्यावरण प्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता और जागरूक नागरिक खुले आसमान के नीचे बैठकर पेड़ों की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं। आंदोलनकारियों का साफ कहना है कि विकास के नाम पर प्रकृति का गला घोंटना अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    भागीरथपुरा दूषित जल कांड के बाद जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली को लेकर पहले से ही जनता में आक्रोश है। अब इस हरियाली बचाओ आंदोलन ने सियासी हलकों में भी हलचल बढ़ा दी है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि समय रहते शासन-प्रशासन नहीं जागा तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

    रीगल चौराहे पर मौजूद दशकों पुराने विशाल पेड़ न सिर्फ इस क्षेत्र की पहचान हैं, बल्कि बेजुबान पक्षियों और जीव-जंतुओं का आश्रय भी रहे हैं। इन्हीं पेड़ों के सहारे शहर की हवा आज भी कुछ हद तक सांस लेने लायक बची हुई है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि इन्हें हटाने या नजरअंदाज करने की साजिश लंबे समय से चल रही है।

    रीगल चौराहे की खाली पड़ी जमीन पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के तहत कुछ पौधे जरूर लगाए गए, लेकिन पौधारोपण के बाद उनकी देखरेख पूरी तरह से उपेक्षित कर दी गई। आरोप है कि मंत्री ने अभियान चलाकर फोटो खिंचवाने तक ही सीमित भूमिका निभाई, जबकि वर्षों से धरती को संजोए खड़े पेड़ों की रक्षा की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई। आंदोलनकारियों का कहना है कि नए पौधे लगाना सराहनीय है, लेकिन जो पेड़ पहले से शहर को जीवन दे रहे हैं, यदि उन्हें बचा लिया जाए तो वही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

    जनहित पार्टी का आमरण अनशन : हरियाली बचाने का बिगुल

      पूरे शहर में अंतिम सांसें गिन रही हरियाली को बचाने के लिए अब जन आंदोलन की औपचारिक शुरुआत हो चुकी है। आंदोलन की पहली कड़ी के रूप में रीगल चौराहे पर देर रात आमरण अनशन शुरू किया गया।पर्यावरण प्रेमी संस्थाओं का कहना है कि ये पेड़ सिर्फ लकड़ी का ढांचा नहीं हैं, बल्कि शहर के फेफड़े हैं। इन्हीं पेड़ों की बदौलत इंदौरवासी आज भी स्वच्छ हवा में सांस ले पा रहे हैं।

    चिंताजनक तथ्य यह है कि शहर में अब मात्र 9 प्रतिशत हरियाली ही शेष बची है, लेकिन हर विकास परियोजना के नाम पर उसी हरियाली पर सबसे पहले कुल्हाड़ी चल रही है। प्रबुद्ध और जागरूक नागरिकों का कहना है कि सरकार को यह समझना होगा कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। विकास के बहाने शहरवासियों की सांसों का व्यापार बंद होना चाहिए। इस आंदोलन से शहर की कई बड़ी सामाजिक और पर्यावरणीय संस्थाएं जुड़ चुकी हैं। सभी संगठनों ने मिलकर इस संयुक्त मंच को “पर्यावरण प्रेमी नागरिक मंच” का नाम दिया है। आंदोलनकारियों का स्पष्ट संदेश है या तो सरकार पेड़ों को बचाए, या फिर यह संघर्ष और तेज होगा।

    Hemant Nagle
    By Hemant Nagle

    हेमंत नागले | पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। वर्ष 2004 में मास्टर ऑफ जर्...Read More

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