Naresh Bhagoria
2 Jan 2026
इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई मौतों और बीमारियों के पीछे केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि वर्षों की प्रशासनिक लापरवाही और निर्णयों में की गई देरी भी सामने आ रही है। चौंकाने वाला खुलासा यह है कि नगर निगम को चार साल पहले ही यह जानकारी थी कि भागीरथपुरा क्षेत्र में नलों से गंदा और संक्रमित पानी सप्लाई हो रहा है। इसके बावजूद समस्या को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, जिसका खामियाजा अब आम जनता को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा।
तीन महीने साइन में लगे, साढ़े तीन साल में भी काम अधूरा
नगर निगम रिकॉर्ड से बाहर आई नोटशीट ने पूरी कहानी उजागर कर दी है। इसके बाद अब खुद अधिकारी भी सवाल उठाने लगे हैं कि जब अत्यंत आवश्यक और जनस्वास्थ्य से जुड़े काम की फाइल को महापौर स्तर पर ही तीन महीने तक रोका गया, तो सारा दोष केवल अधिकारियों पर मढ़ना कितना न्यायसंगत है?
25 नवंबर 2022 को हुई महापौर परिषद की बैठक में संकल्प क्रमांक 106 के तहत भागीरथपुरा क्षेत्र में पाइपलाइन बदलने के लिए टेंडर जारी करने की मंजूरी दी गई थी। इसके आधार पर वार्ड क्रमांक 11 के अंतर्गत भागीरथपुरा टंकी क्षेत्र में पेयजल पाइपलाइन के कार्य के लिए 2 करोड़ 38 लाख रुपये का टेंडर जुलाई 2022 में ही हो चुका था।
टेंडर की स्वीकृति के लिए 23 नवंबर 2022 को जलकार्य समिति को निगमायुक्त की ओर से प्रस्ताव भेज दिया गया। इसके बावजूद फाइल पर 3 फरवरी 2023 को अपर आयुक्त के हस्ताक्षर हुए और उसके बाद 6 फरवरी 2023 को जाकर महापौर के साइन हो सके। यानी सिर्फ हस्ताक्षर कराने में ही करीब तीन महीने का समय निकाल दिया गया।
वर्क ऑर्डर जारी, लेकिन नतीजा शून्य
काफी जद्दोजहद के बाद फाइल आगे बढ़ी और इस काम के लिए वर्क ऑर्डर भी जारी कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि साढ़े तीन साल बीत जाने के बावजूद भी पाइपलाइन का काम अब तक पूरा नहीं हो सका है। नगर निगम के जिम्मेदारों के पास इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं है कि आखिर इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी लोगों को शुद्ध पानी क्यों नहीं मिल पाया। जानकारी के अनुसार पूरे भागीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल पाइपलाइन का काम दो चरणों में होना था। यदि सवा दो करोड़ से अधिक लागत वाला पहला चरण समय पर पूरा हो जाता, तो कम से कम आधी बस्ती को दूषित पानी से राहत मिल सकती थी। जानकारों का मानना है कि यदि यह काम समय रहते पूरा कर लिया गया होता, तो शायद कई जानें बचाई जा सकती थीं।
नोटशीट बाहर आने के बाद बढ़ी किरकिरी
लापरवाही और देरी को उजागर करती नोटशीट निगम रिकॉर्ड से बाहर आने के बाद पूरे मामले में नया मोड़ आ गया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब नगर निगम को पहले से समस्या की जानकारी थी, टेंडर और प्रस्ताव तैयार थे, तो फिर किसके दबाव या किसकी उदासीनता के चलते इस काम को लटकाया गया?
महापौर का पक्ष : सिंगल बिडर था, इसलिए जरूरी था परीक्षण
इस पूरे मामले पर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सफाई देते हुए कहा कि संबंधित टेंडर में केवल एक ही निविदाकर्ता सामने आया था। मालवा इंजीनियर्स नामक ठेकेदार के पूर्व कार्यों का रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं था, इसलिए परीक्षण और जांच जरूरी थी। इसी कारण साइन करने में समय लगा।
जनता पूछ रही सवाल : जिम्मेदारी किसकी?
हालांकि, इन दलीलों के बीच जनता का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा। लोग पूछ रहे हैं कि जब मामला सीधे जनस्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा था, तब फाइलों की जांच और परीक्षण में इतना वक्त क्यों लगाया गया?
अब जब दूषित पानी ने मौत का रूप ले लिया है, तब जिम्मेदारी तय करने के बजाय सिर्फ एक-दूसरे पर आरोप क्यों लगाए जा रहे हैं?