सात साल बाद भारत आ रहे शी जिनपिंग, दौरे के क्या हैं मायने?

चीन के विदेश मंत्रालय ने शी जिनपिंग के भारत आने की पुष्टि कर दी है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। दोनों देशों के बीच गलवान झड़प के बाद रिश्तों में काफी तनाव आया था, हालांकि पिछले कुछ समय में दोनों तरफ से संबंध सुधारने की कोशिशें हुई हैं। इस यात्रा के दौरान सीमा विवाद के साथ व्यापार और आर्थिक सहयोग भी अहम मुद्दे रह सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रिश्तों में सुधार के बावजूद दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी और व्यापार घाटा बड़ी चुनौती बने हुए हैं। शी जिनपिंग के साथ करीब 400 लोगों का प्रतिनिधिमंडल आने की खबरों ने आर्थिक और कारोबारी सहयोग की संभावनाओं को भी चर्चा में ला दिया है। वहीं, भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन से जुड़े कुछ कारोबारी मामलों पर सख्त रुख यह संकेत देता है कि दोनों देशों के रिश्तों में अभी कई अड़चनें कायम हैं।
2019 के बाद पहली बार भारत आएंगे शी जिनपिंग
शी जिनपिंग इससे पहले 2019 में भारत आए थे, जब चेन्नई के पास मामल्लापुरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अनौपचारिक शिखर वार्ता हुई थी। इसके बाद 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के रिश्तों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इस संघर्ष में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी, जबकि चीन ने अपने चार सैनिकों के मारे जाने की बात कही थी। इसके बाद सीमा पर तनाव बढ़ने के साथ दोनों देशों के राजनीतिक और आर्थिक रिश्ते भी प्रभावित हुए। ऐसे समय में शी जिनपिंग का भारत दौरा दोनों देशों के बीच संबंधों को स्थिर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
मोदी-शी मुलाकात पर बनी हुई है नजर
चीन ने शी जिनपिंग के ब्रिक्स समिट में शामिल होने की पुष्टि की है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अलग से द्विपक्षीय बैठक होगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। हालांकि हाल के वर्षों में दोनों नेताओं के बीच संपर्क बढ़ा है और पिछले साल रूस के कजान में हुए ब्रिक्स समिट के दौरान करीब पांच साल बाद उनकी मुलाकात हुई थी। दोनों नेताओं ने एलएसी से सैनिकों की वापसी और 2020 में शुरू हुए सीमा विवाद को सुलझाने के लिए हुए समझौते का स्वागत किया था। इसके बाद पिछले साल मोदी एससीओ बैठक में शामिल होने चीन के तियानजिन पहुंचे थे, जहां उनकी शी जिनपिंग से मुलाकात हुई थी।
रिश्तों में सुधार, लेकिन भरोसे की कमी बरकरार
भारत और चीन के बीच हाल के वर्षों में रिश्तों को सामान्य बनाने के कुछ प्रयास हुए हैं। पिछले साल दोनों देशों ने सीधी उड़ानें फिर शुरू की थीं और भारत ने चीनी कारोबारी प्रोफेशनल्स के लिए वीजा प्रक्रिया में भी कुछ ढील दी थी। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देशों के रिश्तों ने जरूर करवट ली है, लेकिन ट्रस्ट डेफिसिट यानी भरोसे की कमी और ट्रेड डेफिसिट यानी व्यापार घाटा अब भी दो अहम मुद्दे हैं। गलवान के बाद भारत ने साफ कर दिया था कि सीमा पर किसी भी तरह की समस्या का असर पूरे रिश्तों, खासकर व्यापारिक साझेदारी पर पड़ेगा। ऐसे में शी का दौरा रिश्तों को आगे बढ़ाने का अवसर तो है, लेकिन इसे बड़ा बदलाव मानना अभी जल्दबाजी होगी।
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400 लोगों के प्रतिनिधिमंडल से व्यापार पर नजर
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शी जिनपिंग इस दौरे पर करीब 400 प्रतिनिधियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल लेकर आ सकते हैं, जिसमें बड़ी संख्या ट्रेड और कॉमर्स से जुड़े लोगों की हो सकती है। इसे दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने की संभावित कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के पास आर्थिक ताकत है और वह इसका इस्तेमाल एक भरोसेमंद साझेदार बनने के लिए कर सकता है। खासकर ऐसे समय में जब भारत और चीन दोनों अमेरिका की व्यापार नीतियों से प्रभावित हैं, आर्थिक सहयोग की गुंजाइश बढ़ सकती है। हालांकि कारोबारियों के सामने अभी भी कई तरह की मुश्किलें हैं और दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों में पूरी तरह सामान्य स्थिति नहीं लौटी है।




















