BRICS क्या है और इसमें कौन से देश हैं? G20 और SAARC से फर्क भी जानिए, दिल्ली समिट से पहले पढ़ें पूरी जानकारी

दिल्ली में BRICS Summit 2026 को लेकर तैयारियां तेज है और अलग-अलग देशों के डेलिगेशन भारत पहुंचने लगे हैं। ऐसे में BRICS के साथ-साथ G20 और SAARC की भी चर्चा हो रही है। आखिर BRICS क्या है, इसमें कौन-कौन से देश शामिल हैं और यह G20 व SAARC से कैसे अलग है? अगर आपको भी इन तीनों अंतरराष्ट्रीय समूहों को लेकर कन्फ्यूजन है, तो आसान भाषा में पूरी जानकारी समझिए।
BRICS क्या है?
BRICS उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक अंतरराष्ट्रीय मंच है। इसका नाम इसके शुरुआती सदस्य देशों के नाम से बना था। शुरुआत में इसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे, इसलिए इसे BRIC कहा जाता था। बाद में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसमें ‘S’ जुड़ गया और इसका नाम BRICS हो गया। BRIC को 2006 में औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया गया। इसी साल संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान इसके विदेश मंत्रियों की पहली बैठक हुई। इसके बाद 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला BRIC शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। 2010 में दक्षिण अफ्रीका को इसमें शामिल करने पर सहमति बनी और 2011 में उसने BRICS के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया।
BRICS में कौन-कौन से देश हैं?
समय के साथ BRICS का विस्तार हुआ है। वर्तमान समूह में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। BRICS में सदस्य देश आर्थिक सहयोग के अलावा वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी बातचीत करते हैं। इसका एक प्रमुख उद्देश्य वैश्विक व्यवस्था में उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की आवाज को मजबूत करना भी है। यानी BRICS को केवल आर्थिक समूह मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसके मंच पर वैश्विक अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विकास से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा होती है।
G20 क्या है?
अब बात G20 की। इसका पूरा नाम Group of Twenty है। इसमें दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। G20 के मंच पर वैश्विक अर्थव्यवस्था और उससे जुड़े बड़े मुद्दों पर चर्चा होती है। G20 में यूरोपीय संघ के साथ 19 देश शामिल हैं। इनमें भारत, अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं। G20 को संयुक्त राष्ट्र जैसी औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संस्था की तरह नहीं समझना चाहिए। यह प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच बातचीत और सहयोग का एक मंच है। इसकी शुरुआत 1999 में हुई थी। 1990 के दशक के अंत में आए एशियाई वित्तीय संकट के बाद प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक स्थिरता को लेकर बातचीत के लिए ऐसे मंच की जरूरत महसूस हुई थी।
SAARC क्या है?
SAARC का पूरा नाम South Asian Association for Regional Cooperation यानी दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन है। इसका गठन 8 दिसंबर 1985 को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में SAARC Charter पर हस्ताक्षर के साथ हुआ था। इसका मुख्यालय नेपाल की राजधानी काठमांडू में है। SAARC में दक्षिण एशिया के आठ देश शामिल हैं- भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान। इसका मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशियाई देशों के बीच सहयोग बढ़ाना है। इसके दायरे में आर्थिक विकास के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, सामाजिक प्रगति और क्षेत्रीय सहयोग जैसे मुद्दे भी आते हैं।
BRICS और G20 में क्या अंतर है?
BRICS और G20 दोनों में भारत समेत कई बड़े देश शामिल हैं, लेकिन दोनों का आधार अलग है। G20 में दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ लाया जाता है और इसका दायरा वैश्विक है। वहीं BRICS का आधार मुख्य रूप से उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग है। G20 में आर्थिक मुद्दों के साथ कई वैश्विक विषयों पर चर्चा होती है, जबकि BRICS में आर्थिक सहयोग के अलावा वैश्विक शासन व्यवस्था और विकासशील देशों की भूमिका जैसे मुद्दे भी अहम रहते हैं।
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SAARC बाकी दोनों से कैसे अलग है?
SAARC का फोकस दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग पर है। यानी अगर आसान तरीके से समझें तो G20 का दायरा वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, BRICS उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का मंच है, जबकि SAARC दक्षिण एशिया के पड़ोसी देशों के बीच सहयोग पर केंद्रित है।
तीनों को एक लाइन में ऐसे समझिए
BRICS - उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का मंच।
G20 - दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का वैश्विक मंच।
SAARC - दक्षिण एशिया के देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग का संगठन।
इसी वजह से दिल्ली में होने वाला BRICS Summit 2026 महत्वपूर्ण है। जब सदस्य देश एक मंच पर जुटते हैं, तो बातचीत केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वैश्विक राजनीति, विकास और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा होती है।




















