
प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। सिर्फ मैं ही नहीं मेरे जैसे एम-2, एम-3, एम-4 जैसे कई हैं। हम सभी हर दिन कई रिसर्च का हिस्सा बनते हैं। मैं इंसान नहीं बल्कि एक छोटा सा चूहा हूं। मेरी दुनिया बहुत बड़ी है-एक ऐसी दुनिया, जहां हर दिन जिंदगी और मौत के बीच झूलता हूं... सिर्फ आपके लिए। आज वर्ल्ड डे फॉर लैबोरेट्री एनिमल के मौके पर शहर की एनिमल लैब में हो रहे शोध सामने आए हैं। भोपाल में 750 से ज्यादा जानवरों पर अलग-अलग बीमारियों और रिसर्च के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं।
राजधानी भोपाल में करीब चार एनिमल लैब हैं, जहां बीमारी और एकेडमिक रिसर्च के लिए जानवरों पर शोध किया जा रहा है। इनमें एम्स भोपाल के साथ आईसर, हाई सिक्योरिटी एनिमल लैब और वीएनएस कॉलेज में करीब 750 जानवरों पर विभिन्न शोध किए जा रहे हैं। एम्स अस्पताल के अधीक्षक डॉ. विकास गुप्ता के मुताबिक लैब में कैंसर, डायबिटीज, निमोनिया, डेंगू जैसी बीमारियों की दवाओं पर रिसर्च की जा रही है। शोध में यह भी पता लगाया जाता है कि कौन सी दवा का कितना प्रभाव या दुष्प्रभाव होता है। हर दिन इन जानवरों को नए प्रयोगों से गुजरना पड़ता है। यह शोध इंसानों के इलाज के लिए बेहद जरूरी माना जाता है। कई बार इन प्रयोगों के दौरान जानवरों की जान भी चली जाती है। लेकिन वैज्ञानिकों के लिए यह रिसर्च आगे बढ़ाने का हिस्सा होता है। इन प्रयोगों के जरिए नई दवाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।
ये भी पढ़ें: दिल्ली मर्डर केस: IRS अधिकारी की बेटी की हत्या का मामला, जानें आरोपी ने कोर्ट में क्या कहा ?
रिसर्च के लिए जिन जानवरों का उपयोग किया जाता है उनमें मुख्य रूप से चूहे और माइस (छोटे चूहे) होते हैं। भारत सरकार द्वारा इनके रहने, खाने, सुरक्षा के लिए कड़े मापदंड तैयार किए गए हैं। इन जानवरों के सभी सुख सुविधाओं से लैस एयर कंडीशंड लैब होती है। शोध में जानवरों के उपयोग से पहले केंद्र सरकार की एथिकल कमेटी से मंजूरी लेनी होती है। कमेटी तय करती है कि इस शोध के लिए जानवरों की जरूरत है या नहीं। शोध के दौरान इन जानवरों को ताउम्र ससम्मान पालना होता है। अगर किसी जानवर में ऐसे साइड इफेक्ट होते हैं, जिससे उसका बाकी का जीवन दर्दभरा हो, तो फिर उसे नियमानुसार खत्म किया जाता है। इसे सेक्रिफाइज कहा जाता है। यह प्रक्रिया भी तय नियमों के तहत ही की जाती है। वैज्ञानिक यह सुनिश्चित करते हैं कि जानवरों को कम से कम कष्ट हो।
बीएनएस में ब्रेन स्ट्रोक के लिए नॉस्केफिन नामक कैमिकल का असर पता करने का शोध सफल रहा। बीएनएस में जेस्मिनम सन बैक यानी मोगरा के तत्वों का आर्थराइटिस पर प्रभाव जानने जानवरों पर शोध किया गया जो सफल रहा। भोपाल एम्स में ब्रेन ट्यूमर के लिए नई दवा के उपयोग के लिए शोध किया जा रहा है। फिलहाल यह शोध जारी है। इन शोधों के जरिए नई दवाओं और इलाज के तरीके विकसित किए जा रहे हैं। वैज्ञानिक लगातार नई संभावनाओं की तलाश में लगे हुए हैं। यह रिसर्च भविष्य में कई गंभीर बीमारियों के इलाज में मददगार साबित हो सकती है। इन प्रयोगों के पीछे जानवरों की बड़ी भूमिका होती है। हर सफलता के पीछे कई असफल प्रयास भी छिपे होते हैं।
ये भी पढ़ें: रिकॉर्ड मतदान के बाद बोलीं ममता बनर्जी... मुझे किसी पद की इच्छा नहीं, केंद्र में भाजपा का अंत चाहती हूं
एनिमल टेस्टिंग कोई एक जगह तक सीमित नहीं है यह दुनिया भर में अलग-अलग क्षेत्रों और संस्थानों में की जाती है। मेडिकल और दवा अनुसंधान में सबसे ज्यादा उपयोग होता है, जहां नई दवाओं, वैक्सीन और इलाज को इंसानों पर लागू करने से पहले जानवरों पर टेस्ट किया जाता है। फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री में नई दवाओं की सेफ्टी और प्रभाव जांचने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। कॉस्मेटिक इंडस्ट्री में भी कुछ देशों में अभी यह जारी है, हालांकि कई जगह इसे बैन किया जा चुका है। केमिकल और इंडस्ट्रियल टेस्टिंग में भी सुरक्षा जांच के लिए इसका उपयोग होता है। शिक्षा और रिसर्च संस्थानों में स्टूडेंट्स को समझाने और प्रयोग के लिए इसका सहारा लिया जाता है। डिफेंस और स्पेस रिसर्च में भी कुछ देशों में इसका इस्तेमाल किया जाता है।